रमजान में मां की याद

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मेरे घर में नमाज-रोजा को लेकर कोई बंदिश नहीं थी। मेरी मां रात को सोने से पहले घर के तमाम सदस्यों से पूछती थीं कि कल कौन-कौन रोजा रखेगा। घर के जो लोग रोजा रखते, भोर को सहरी खाने के लिए मां सिर्फ उन्हें ही उठातीं। साथ ही, इसका भी ध्यान रखतीं कि जो लोग रोजा नहीं रख रहे, उनकी नींद में कोई बाधा न आए। इसलिए वे सहरी के लिए जगाते हुए अपनी आवाज धीमी रखतीं।

 

 

नमाज के मामले में भी हमारे यहां ऐसा ही नियम था। जिसकी इच्छा होती, वह नमाज पढ़ता, जिसकी इच्छा नहीं होती, वह नहीं पढ़ता। लेकिन इस वजह से कोई किसी की निंदा नहीं करता था। मेरे घर का यह नियम लिखित या मौखिक नहीं, बल्कि सहज स्वाभाविक था। इफ्तार के समय मां सबको खाने के लिए बुलातीं। सब एक साथ खाने के लिए बैठते, तो मां सबकी थाली में एक ही तरह परोसतीं। उस समय वह रोजा रखने वालों और न रखने वालों में कोई भेद नहीं करती थीं। तब मैं समझ नहीं पाई थी। लेकिन आज समझ पाती हूं कि मेरा घर एक आदर्श घर था।

हमारे घर से मस्जिद की अजान सुनाई नहीं पड़ती थी। बीती सदी के छठे-सातवें, यहां तक कि आठवें दशक में भी बांग्लादेश में मस्जिदों की संख्या ज्यादा नहीं थी। लेकिन घर के जो लोग नमाज पढ़ते थे, उन्हें नमाज के समय को लेकर किसी किस्म की असुविधा नहीं होती थी। हमारे घर में दीवाल घड़ी थी। मेरी मां तो आंगन में धूप की जगह देखकर ही बता देती थीं कि नमाज का समय हुआ है या नहीं। कुरान में मैंने पढ़ा है, ला इक्राहा फिद्दीन। यानी धर्म में कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं है। मुझे लगता है, कुरान की सबसे कीमती आयत यही है। इस्लाम के जानकार इस आयत की व्याख्या इस प्रकार करते हैं, इस्लाम का जोर-जबर्दस्ती, बल प्रयोग, अत्याचार और ध्वंसात्मक कार्रवाइयों से कोई संबंध नहीं है। ये सभी क्रियाकलाप इस्लाम-विरोधी हैं।

 

इस आयत को पूरी तरह मानने पर पृथ्वी को शांतिपूर्ण बनाना संभव है। मैं समझ नहीं पाती कि कुरान में लिखी गई बातों पर जो लोग गर्व करते हैं, वे इनके बारे में चर्चा क्यों नहीं करते। अल्लाह ने भी कहा है कि धर्म में कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं है। अल्लाह के बंदे अल्लाह के उपदेशों का पालन करेंगे, यही तो स्वाभाविक है। लेकिन वास्तव में हो क्या रहा है? संयुक्त अरब अमीरात ने एक नया कानून लागू किया है। इसके तहत रमजान के महीने में जो भी व्यक्ति बाहर कुछ खाएगा या पिएगा, उसे भारी जुर्माना अदा करने के साथ-साथ एक महीना जेल की सजा भी काटनी होगा। बांग्लादेश में रमजान के महीने में खाने-पीने की दुकानों को दिन में खोलने की इजाजत नहीं है। अगर कोई दुकान खोल भी लेता है, तो रोजेदार उन दुकानों में तोड़फोड़ मचाते हैं। क्या गैर मुस्लिमों को इस महीने घर के बाहर कहीं बैठकर पानी पीने की इजाजत नहीं होनी चाहिए? रमजान के महीने में हालत यह है कि बाहर कहीं किसी को भी पानी पीते देख लिया, तो जोर-जबर्दस्ती, बल प्रयोग और तोड़फोड़ के उदाहरण सामने आते हैं। रोजादारों को लगता है कि रमजान में कोई उनके सामने कुछ खा-पीकर उनका अपमान करता है। मैं तो अपनी रोजादार मां के सामने ही पेट भरकर खाती थी। मेरे पेट भरकर खाने पर उन्हें संतुष्टि मिलती थी, जैसी कि हर मां को मिलती है। मेरी मां को तो कभी ऐसा नहीं लगता था किे रोजे में उनके सामने खाकर मैं उनका अपमान करती हूं। मुझे तो कभी ऐसा नहीं लगा कि रोजा न रखने के कारण मेरी मां मुझसे असंतुष्ट हैं।

मेरी मां सिर्फ एक भद्र महिला ही नहीं थीं। वह एक धर्मनिष्ठ महिला भी थीं। लेकिन रोजा रखने और न रखने की आजादी को वह महत्व देती थीं। आजकल के धार्मिक व्यक्तियों में मैं सहिष्णुता का यह गुण प्रायः नहीं देखती। आज तो धार्मिक होने का मतलब असहिष्णुता और अराजकता ही रह गया है।

बांग्लादेश में रमजान के महीने में रात रहते ही लोगों को जगाने की कवायदें शुरू हो जाती हैं। इसमें उन लोगों की भी नींद टूट जाती है, जो सहरी नहीं खाते या रोजा नहीं रखते। मेरे कहने का मतलब यह है कि धार्मिक मान्यताओं में उदारता बरतने की जो गुंजाइश पहले थी, वह अब खत्म हो गई है। अजान के मामले में भी यही बात कही जा सकती है। जब लोगों के पास अलार्म वाली घड़ी नहीं थी, मोबाइल फोन नहीं था, तब सहरी के लिए मोहल्ले के लोगों द्वारा उठाने की प्रथा लाभदायक थी। लेकिन अब जब सहरी के वास्ते उठने के लिए तमाम तकनीकी उपकरण उपलब्ध हैं, तब भोर को ही लोगों को उठाने के लिए आवाजें लगाने का कोई औचित्य नहीं है।

चीन ने अपने यहां के मुस्लिम बाहुल्य वाले इलाकों में रोजा रखने पर प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि यह प्रतिबंध सरकारी कर्मचारी, कम्युनिस्ट पार्टी के नेता-कर्मचारी और छात्रों पर ही लागू है। बीजिंग शायद यह समझ बैठा है कि रोजा रखने से शरीर ठीक से काम नहीं करता, इसलिए उसने सरकारी कर्मचारियों के रोजा रखने पर बंदिश लगाई है। छात्रों पर भी इसी वजह से बंदिश लगी है। जबकि कम्युनिस्ट चूंकि खुद को नास्तिक मानते हैं, ऐसे में उन्हें धार्मिक मान्यताओं का पालन करने से रोका गया है। मैं हालांकि चीन के इस फैसले की विरोधी हूं, क्योंकि मैं यह नहीं मानती कि रोजा रखने से शरीर शिथिल हो जाता है। दुनिया भर में असंख्य मुस्लिम रोजा रखते हुए अपना कामकाज उसी कुशलता से निपटाते हैं।

रोजा को लेकर दो तरह के जो अतिरेक देखने में आ रहे हैं, वह मेरे लिए आश्चर्यजनक है। एक तरफ बांग्लादेश जैसा मुल्क है, जो रमजान के महीने में गैर मुस्लिमों के लिए उदारता नहीं दिखाता। दूसरी तरफ चीन है, जो कम्युनिज्म की आड़ में दूसरों की धार्मिक मान्यताओं को दबाता है। यहां मैं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जिक्र करना चाहूंगी, जो मुस्लिम न होने के बावजूद नमाज पढ़ती और रोजा रखती हैं। मैं जानती हूं कि ऐसा वह अपने राजनीतिक लाभ के लिए करती हैं, फिर भी मैं इसके लिए उनकी आलोचना नहीं करूंगी। मनुष्य को जिस तरह धर्म न मानने की आजादी होनी चाहिए, उसी तरह एक आदमी कई धर्म की मान्यताओं का पालन करे, इसकी आजादी भी उसे होनी चाहिए। पर एक बात मैं जरूर कहना चाहूंगी, इस्लाम अगर उदार नहीं होगा, तो उसका खामियाजा मुसलमानों को ही सबसे अधिक भुगतना पड़ेगा।

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