ये हैं रविवार के श्रेष्ठ योग, इनमें कीजिए शुभ काम

surya-5524ae45078a2_l 20 सितम्बर 2015 को रविवार है। इस दिन शुभ वि.सं.- 2072, संवत्सर नाम- कीलक, अयन- दक्षिण, शाके- 1937, हिजरी- 1436, मु. मास- जिलहिज-5, ऋतु- शरद्, मास- भाद्रपद, पक्ष- शुक्ल है।

शुभ तिथि

सप्तमी भद्रा संज्ञक तिथि अर्द्घरात्रि के बाद 2.24 तक, तदन्तर अष्टमी जया संज्ञक तिथि रहेगी। सप्तमी तिथि में विवाहादि मांगलिक कार्यों सहित जनेऊ, संगीत-नृत्य-कलादि कार्य, वस्त्रालंकार, यात्रा, प्रवेश, वाहन, सवारी आदि विषयक कार्य और अष्टमी तिथि में नाचना, गाना आदि मनोविनोद के कार्य, रत्न, अलंकार, शस्त्रादि धारण, वास्तुकर्म व विवाहादि मांगलिक कार्य सिद्ध होते हैं।

सप्तमी तिथि में जन्मा जातक सामान्यतः धनवान, प्रतिभाशाली, कलाकार, सुन्दर, मान-सम्मान पाने वाला और सन्तानादि का सुख भोक्ता होता है।

नक्षत्र

ज्येष्ठा नक्षत्र सम्पूर्ण दिवारात्रि रहेगा। ज्येष्ठा नक्षत्र में लोहा, कारीगरी, स्नेह, विधि (अर्क तेलादि बनाना) अक्षरारम्भ, मुण्डन और चित्र संबंधी समस्त कार्य करने चाहिए। ज्येष्ठा गण्डान्त मूल संज्ञक नक्षत्र भी है। अतः ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्मे जातकों के संभावित अरिष्ट निवारण के लिए आगे 27 दिन बाद जब ज्येष्ठा की पुनरावृत्ति हो, उस दिन नक्षत्र शान्ति (मूल शान्ति) करा लेना जातकों के हित में होगा।

ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्मा जातक बुद्धिमान, चतुर, होशियार, बहुमित्र, सन्तोषी, शीतल स्वभाव, कला का शौकीन, पर थोड़ा क्रोधी, कामलोलुप और कलहप्रद होता है। यह छिद्रान्वेषी व अच्छा आलोचक भी होता है। इनका 13-27-31 व 49वां वर्ष स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं होता।

योग

प्रीति नामक योग सायं 6.48 तक, तदन्तर आयुष्मान नामक योग रहेगा। दोनों नैसर्गिक शुभ योग हैं।

करण

गर नामकरण दोपहर बाद 2.07 तक, तदुपरान्त रात्रि 2.24 तक भद्रा रहेगी। भद्रा में शुभ कार्य वर्जित कहे गए हैं।

चंद्रमा

सम्पूर्ण दिवारात्रि वृश्चिक राशि में रहेगा।

व्रतोत्सव

रविवार को भानु व मुक्ता भरण सप्तमी, संतान व दुबड़ी सप्तमी, मेला देव नारायण जी का तथा ललिता सप्तमी (बंगाल व उड़ीसा में)।

शुभ मुहूर्त

उक्त शुभाशुभ समय, तिथि, वार, नक्षत्र व योगानुसार रविवार को किसी शुभ व मंगल कृत्यादि के शुभ व शुद्ध मुहूर्त नहीं हैं।

वारकृत्य कार्य

रविवार को राज्याभिषेक, उत्सव, गाना-बजाना, नई सवारी पर चढ़ना, यात्रा, नौकरी, पशु क्रय विक्रय, यज्ञ हवन, औषध निर्माण व सेवन, अस्त्र-शस्त्र-व्यवहार, सोना, ताम्बा, ऊन व काष्ठ सम्बंधी कार्य और मंत्रोपदेश आदि कार्य शुभ व सिद्ध होते हैं।

 

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