उपचुनावों के नतीजों से लगता है कि अब टूट रहा है बीजेपी का समीकरण

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यूपी-बिहार में जबर्दस्त सोशल इंजीनियरिंग की थी. बीजेपी ने गैर यादव पिछड़ी जातियों के अपने पक्ष में लामबंद किया था और इसकी वजह से पार्टी को हिंदी पट्टी में जबर्दस्त सफलता भी मिली थी. लेकिन उपचुनावों के नतीजों से ऐसा लगता है कि बीजेपी का यह समीकरण अब टूट रहा है. दोनों राज्यों में तीन लोकसभा सीटों पर उप-चुनाव हुए और तीनों पर बीजेपी को हार मिली है.

उपचुनावों के नतीजों से लगता है कि अब टूट रहा है बीजेपी का समीकरण इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, साल 2014 के आम चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने यूपी-बिहार में लोकसभा की 104 सीटें हासिल की थीं. अकेले बीजेपी ने इन दोनों राज्यों में 93 सीटें हासिल की थीं. एनडीए ने कुल 383 सीटें हासिल की थीं और बीजेपी को 282 सीटें मिली थीं. इस जीत की एक बड़ी वजह यह माना गया था कि बीजेपी ने गैर यादव पिछड़ी जातियों का जबर्दस्त समीकरण बनाते हुए एक बहुत बड़ा वोट हिस्सा अपने पाले में कर लिया था.

बीजेपी ने साध लिया था इस वर्ग को

यूपी-बिहार में यादवों के उभार और सत्ता में रहने के दौरान कुछ लोगों की दबंगई से इन प्रदेशों की दूसरी पिछड़ी जातियां उपेक्ष‍ित महसूस कर रही थीं. बीजेपी ने हिंदुत्व, सामाजिक समरसता और राष्ट्रवाद जैसे नारों को जोर-शोर से उछालते हुए इस वर्ग में अपनी अच्छी पैठ बना ली. 2014 के चुनाव में बीजेपी ने यूपी में अपने एक-तिहाई उम्मीदवार गैर यादव ओबीसी जातियों से उतारे थे. इसी प्रकार बिहार में भी बीजेपी ने ऐसी पैठ कायम की थी और नीतीश कुमार के साथ आने के बाद ऐसा माना जाता रहा था कि उसका यह समीकरण और मजबूत हुआ है.  

लेकिन दोनों राज्यों की तीन लोकसभा चुनावों के नतीजों ने यह संकेत दिया है कि बीजेपी का समीकरण टूट रहा है और उसे यूपी में सपा-बसपा गठजोड़ से जबर्दस्त चोट मिली है. दूसरी तरफ बिहार में इन वर्गों में लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल ने अच्छी सेंधमारी की है.

यूपी में दोनों सीटों गोरखपुर (प्रवीण निषाद) और फूलपुर (नागेंद्र पटेल) के विजेता गैर यादव ओबीसी समुदाय से आते हैं. फूलपुर में सपा के कुर्मी कैंडिडेट ने बीजेपी के कुर्मी कैंडिडेट पर ही विजय दर्ज की है. यह सीट ओबीसी बहुल मानी जाती है. यह इस बात का साफ संकेत है कि एक ही समुदाय के दो कैंडिडेट होने पर भी लोगों ने सपा के कुर्मी उम्मीदवार को चुनना मुनासिब समझा.

इसी प्रकार गोरखपुर में सपा के विजेता कैंडिडेट प्रवीण कुमार परंपरागत तौर पर मत्स्यपालन से जुड़े निषाद समुदाय से आते हैं. यह समुदाय पूर्वी यूपी के नदियों के किनारे स्थ‍ित गांवों-कस्बों में बड़ी संख्या में रहता है. माना जाता है कि गोरखपुर संसदीय सीट में करीब 3.5 लाख निषाद वोटर हैं. यह भी माना जाता है कि साल 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान इस समुदाय ने बीजेपी को वोट दिया था. लेकिन इस बार निषाद समुदाय योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व के आह्वान से प्रभावित नहीं हुआ.

यही नहीं बिहार में भी गैर यादव ओबीसी वोटर्स ने इस बार बीजेपी का साथ नहीं दिया. इस मामले में उसको इस बार पिछड़ी जातियों की आधार वाली पार्टी जेडीयू के साथ का भी कोई फायदा नहीं मिला. अररिया में बीजेपी के गैर यादव ओबीसी निषाद समुदाय के उम्मीदवार प्रदीप कुमार सिंह को आरजेडी कैंडिडेट सरफराज आलम ने हरा दिया.

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