…. यह सड़क सीधे बीजिंग जाती है, नॉनस्टॉप

लेखक: जगदीश जोशी
हेडिंग देख कर चौंक गए होंगे, ये किस सड़क का जिक्र हो रहा है, जो सीधे बीजिंग जाती है। लखनऊ और बीजिंग के बीच तो बहुत दूरी है। अगर गोरखपुर के रास्ते सोनौली बॉर्डर होते हुए बीजिंग जाने वाली सड़क का जिक्र हो रहा है तो यही सड़क नेपाल में जाकर गड़बड़झाला हो जाएगी। इसी तरह अयोध्या- गोरखपुर से सिलिगुड़ी होते हुए बर्मा यानी म्यामार की ओर जाने वाली सड़क की बात हो रही है तो वह भी आगे चल कर कई देशों की चकरघिन्नी बन जाएगी। जी हां, आप ठीक समझ रहे हैं।
विडंबना यही है, आप समझ जाते हैं मगर वो नहीं समझते कि आप समझते हैं। ये ‘वो’ वही हैं जो आपको इशारा कर बताते हैं कि ये सड़क अमुक जगह जा रही है। उस जगह हालात बहुत खराब हैं, तनाव चरम पर है। कभी भी गोलियां चल सकतीं हैं। हमारी सेना कभी भी उन्हें सबक सिखा सकती है। किसी भी क्षण धूल-धूसरित कर सकती है, अस्तित्व ही नक्शे से मिटा सकती है। उनकी अब खैर नहीं।
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‘एकदा नैमिषाण्ये की तर्ज पर’ बहुत पहले की बात है। ईराक के निरंकुश शासक सद्दाम हुसैन की बड़ी सी प्रतिमा गिराने के लाइव प्रसारण पर दर्शक तालियां बजा रहे थे। आसमान में अमेरिका और नाटो देश, अपने क्रूज मिसाइलों की टेस्टिंग कर रहे थे। आसमानी आतिशबाजी के सीन भी बड़े ही आकर्षक लगते थे। कभी दूर तक उजाले की लकीर बनती तो कभी पूरा इलाका अनार की तरह रौशनी फैंकता। रोज कुछ न कुछ नया देखने को मिल रहा था। दर्शकों ने टीवी देखने का टाइम भी बढ़ा लिया। फिर क्या था। दर्शकों का मूड भांप कर, हमारे देश के कई तेज तर्रार ‘संजयों’ को आनन-फानन में रवाना कर दिया गया। इन्हें ईराक में प्रवेश की अनुमति तो नहीं मिली, मिन्नतें बेकार गईं। आसमान से गोले गिराने की जवाबी कव्वाली चल रही थी तो वहां कौन जाने को देता? मगर, लहरें गिन कर पैसा कमाने की कहावत तो हमारे ही देश में लागू होती है न।
एसाइनमेंट मिला था तो कुछ न कुछ तो फाइल करना ही था। भलेही तीन-चार सौ किमी दूर बैठ कर करना पड़ रहा था। वर्ष 1990 से 92 का दौर भी ‘संजयों’ की यह पीढ़ी देख चुकी थी। दर्शक और पाठक को कैसे अपने साथ बांधा जाए, यह हुनर इस दौर में सीख ही चुके थे। इन ‘संजयों’ में होड़ लग गई कि अन्य टीवी चैनलों के मुकाबले कुछ नया और अजूबा मैटीरियल पेश करना है। चैनल मालिक खुश थे, खूब दर्शक मिल रहे थे, विज्ञापन दाता भी बहती गंगा में हाथ धोकर पुण्य कमा लेना चाहते थे।
चैनल प्रबंधन चाहता था कि दर्शक टीवी से चिपके रहें और अपने सर्किल में इसका प्रचार भी करते रहें। फिलहाल उनकी रणनीति सटीक बैठ रही थी। ‘संजयों’ को भी अपने देश से रोजाना फीडबैक मिल रहा था कि स्टोरी आइडिया हिट है। मजा आ गया, रेवन्यू यानी विज्ञापन से पैसा भी खूब आ रहा है। रणभूमि के पहले वाले देश में रुक कर वहीं से लड़ाई की रिपोर्टिंग कर ‘संजय’ उत्साहित हो रहे थे और धन्य भी।
एक उत्साही ‘संजय’ तो इतना उत्साहित हो गए कि चौड़ी सी वीरान सड़क के बीचों-बीच खड़े हो गए। लगभग चीखते हुए अंदाज में बोल पड़े- ये जो सड़क दिख रही है, यही बगदाद जाती है। बगदाद यहां से सिर्फ 300 किमी दूर है। उन्होंने तुरंत ही अपने कैमरामैन को लौंग शॉट लेने का आदेश दिया, ताकि भारतीय दर्शक देख सकें कि खाड़ी देशों की सड़कों के दोनों ओर पेड़ नहीं होते, रेत ही रेत नजर आती है।
वह रुके नहीं, बोले- बस हम निकल चुके हैं, कुछ ही दिनों में बगदाद फतह हो जाएगी। बस…. यही सड़क बगदाद जाती है। बाद में पता चला कि लड़ाई खत्म हो जाने के कई दिन होने पर भी वह उस सड़क से बगदाद नहीं पहुंच पाए। हमारे देश में शिक्षा दी जाती है न, सामने वाले मूड देख कर बात करनी चाहिए। उन्होंने वैसा ही किया, उस समय जनता का मूड ही यही था कि वह देखे ईराक में क्या हो रहा है? वहां गए ‘संजय’ जो भी कहते उसे भारतीय दर्शक, द्वापरकालीन संजय की कुरुक्षेत्र से की गई रिपोर्टिंग के समकक्ष मान लेते।
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करीब-करीब ऐसा ही कारगिल युद्ध के दौरान देखने को मिला। मगर यहां स्थति थोड़ जुदा थी, हमारे जांबाज फौजी पहाड़ों की तलहटी से चोटी की ओर गोले-गोलियां चला कर टाइगर हिल जैसे रणक्षेत्र अपने नाम कर रहे थे। दुर्गम इलाका होने के कारण ज्यादा कुछ सूचनाएं बाहर आ नहीं पा रही थीं। संजय यहां पर मैदान फतह होने के बाद ही पहुंच कर लकीर पीटते पाए। तब तक अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला नहीं हुआ था। इस हमले ने भारतीय पत्रकारिता को एक नया शब्द प्रचलन में दिया- ‘ग्राउंड जीरो।’ ग्राउंड जीरो के आते ही संजयों की प्लानिंग और न्यूजरूमों के शब्दकोष में ग्राउंड जीरो छा गया। इसे मुंबई पर पाकिस्तानी कसाब जैसे तथाकथित ‘नॉन स्टेट एक्टरों’ के हमले के वक्त खूब सुना और देखा गया।
कोरोना काल में पूर्वी लद्दाख की एलएसी पर चीनी सेना का जमावड़ा हो गया। भारतीय सेना अपनी रणनीति के तहत चीनियों को पीछे धकेलने का काम कर रही है। टीवी पर एक बार फिर से देश प्रेम का ज्वार आ चुका है। अब फिर से लेह की सड़कें गलवान और पेंगोंग त्सो झील की ओर जाते हुए दिखाई देने लगीं है। लेह के किसी लोकेशन पर खड़े-खड़े हमारे ‘संजय’ चीनी ड्रैगन को धूल चटा रहे हैं। कई बार तो इसका असर न्यूज रूम के संपादकीय सहयोगियों तक पर पड़ रहा है। दुनिया के सबसे ऊंचे पठार पर बने ‘कुरुक्षेत्र’ को दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर में तैनात अमेरिकी एयर क्राफ्ट कॅरियरों के जरिए जीतने का सपना दिखा रहे हैं। किसी न किसी चैनल पर रात में प्राइम टाइम के बाद इन विध्वंसकों को गोले बरसाते हुए देखा जा सकता है।
सुखद आश्चर्य यही है कि स्टूडियो में बैठे ऐंकर यहीं से बीजिंग पराजय की घोषणा कर रहे हैं। पिछली मई से देखा जाए तो दौलतबेग ओल्डी, गलवान घाटी, पेंगोंग त्सो, ब्लैक टॉप आदि के चर्चा में आते ही हम हर बार चीन को परास्त कर चुके हैं। कई बार लगता है, लखनऊ से बीजिंग सीधी बस सेवा शुरू होने वाली है, बस इसकी घोषणा होनी बाकी है, शायद टीवी वाले इसमें पिछड़ गए हैं। सब जीता जा चुका है, चीनी युद्धक जहाज खिलौंना साबित हो चुके हैं, चीन की दीवार में हमारे युवा सेल्फी ले रहे हैं। अचानक यह सवाल दिमाग में आता है कि जब सब फतह हो ही गया है तो ये रक्षा मंत्री राजनाथ जी, डोभाल साहब, जनरल रावत आदि अब क्यों मंत्रणा कर रहे हैं। एस जयशंकर जी मास्को की ठंड में चीनी विदेश मंत्री से क्यों चोंच लड़ा रहे हैं। अब कुछ दिन तो आराम करलें। सेना से भी कह दें रिलैक्स…. ।
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