मिशन 2019: पंजाब की मालवा बेल्ट में सियासी दलों के बीच होगा कड़ा मुकाबला

पंजाब में लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान सियासी दलों के बीच कड़े मुकाबले की बिसात मालवा क्षेत्र में ही बिछेगी और सभी को अग्निपरीक्षा देनी होगी। प्रदेश की कुल 13 में से 8 लोकसभा सीटों वाले इस क्षेत्र के मतदाताओं के धार्मिक और जातीय समीकरण हमेशा सियासी दलों का गणित बिगाड़ते रहे हैं। ऐसा बहुत कम हुआ है कि चुनाव मैदान में उतरे राजनीतिक दलों ने जो रणनीति बनाई हो, उसके अनुकूल मालवा में परिणाम हासिल हुए हों।मिशन 2019: पंजाब की मालवा बेल्ट में सियासी दलों के बीच होगा कड़ा मुकाबला

2014 के लोकसभा चुनाव में जहां मालवा के मतदाताओं ने आम आदमी पार्टी के चार सांसदों को चुनकर पूरे देश को हैरान कर दिया था, वहीं प्रदेश में सत्ताधारी अकाली-भाजपा गठबंधन को तीन और कांग्रेस को केवल एक सीट इस क्षेत्र में हासिल हुई थी। लोकसभा चुनाव 2019 के लिए मालवा में परिस्थितियों में मामूली बदलाव है। पहला, सूबे की सत्ता कांग्रेस के हाथ में है और किसानों की कर्ज माफी योजना के तहत अब तक जितने भी कर्ज माफ किए गए हैं, उनमें ज्यादातर किसान मालवा क्षेत्र से संबंधित हैं।

दूसरे, डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के जेल में होने के कारण इस बार मालवा के 13 जिलों में करीब 35 लाख डेरा प्रेमियों के एकमुश्त वोट किसी एक पार्टी के पक्ष में जाना संभव नहीं लग रहा। तीसरे, अकाली दल के टूटने और बेअदबी के मामले में घिरने के कारण पंथक वोट खिसकने की आशंका बढ़ गई है।

साथ ही आम आदमी पार्टी की जो इमेज इस क्षेत्र में 2014 के चुनाव में कायम हुई थी, वह 2019 में आते-आते लगभग धराशायी हो चुकी है। संगरूर सीट पर भगवंत मान को छोड़कर पार्टी के बाकी तीनों सांसद आप से किनारा कर चुके हैं। इस लिहाज से आप के लिए मालवा क्षेत्र में चुनाव इस बार अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा।

किसानों की खुदकुशी के मामले सबसे ज्यादा इसी रीजन से

कांग्रेस की कर्ज माफी योजना के बावजूद इस क्षेत्र में किसानों की आत्महत्या के मामले सर्वाधिक देखने को मिले हैं। इसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है। मालवा क्षेत्र की खास बात यह भी रही है कि प्रत्येक चुनाव में इस क्षेत्र के अजा वोटर निर्णायक साबित होते रहे हैं। यह मालवा के एसी मतदाता ही थे, जिनके फैसले ने पंजाब के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 2012 में पहली बार विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी (अकाली-भाजपा गठबंधन) को दोबारा सत्ता सौंप दी। दरअसल, पंजाब में कुल 32 फीसदी अजा आबादी का ज्यादातर हिस्सा मालवा में बसता है।

दोआबा के अजा जहां अमीर और साधन संपन्न हैं, वहीं मालवा के अधिकतर एसी वर्ग मजदूर हैं। 2012 में अकाली-भाजपा ने आटा-दाल स्कीम के सहारे दोबारा सत्ता हासिल कर ली थी। अब लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस, कर्ज माफी और भूमिहीन मजदूरों की कर्ज माफी योजनाओं के साथ-साथ राहुल गांधी द्वारा गत दिवस घोषित की गई, गरीबों को 12000 रुपये मासिक राशि देने की योजना के सहारे मालवा क्षेत्र के अजा को आकर्षित करने का प्रयास करेगी।

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