इस अधूरे काम को पूरा करने के लिए यह महिला 4 महीने तक लेती रही सांसें…

- in ज़रा-हटके

यह महिला आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन दुनिया को अलविदा कहने से पहले जिस तरह इन्होंने अपनी आखिरी जिम्मेदारी निभाई, वह वाकई काबिले तारीफ है।

इस अधूरे काम को पूरा करने के लिए यह महिला 4 महीने तक लेती रही सांसें...
एक हादसे में दिमाग में चोट लगने के कारण इनकी मौत हो गई थी। फिर भी यह पूरे 123 दिन यानी करीब 4 महीने तक जिंदा रहीं।

दरअसल, जब इनकी मौत हुई, उस वक्त यह 9 हफ्ते की प्रेग्नेंट थीं। एक्सिडेंट के बाद जब इन्हें अस्पताल ले जाया गया तो डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि बच्चों के बचने की कोई उम्मीद नहीं है।

लेकिन महिला के पति को किसी चमत्कार के होने का यकीन था। लिहाजा, डॉक्टरों ने दोबारा जांच किया तो पाया कि महिला के अंग अभी काम कर रहे थे और गर्भ में पल रहे शिशु की धड़कने भी चल रही थीं।

महिला ब्रेन-डेड हो चुकी थी लेकिन गर्भ में पल रहे बच्चों को जिंदा रखने के लिए डॉक्टरों ने मशीन की मदद से उन्हें जिंदा रखने का फैसला किया।

महिला को अस्पताल में चौबीसों घंटे डॉक्टरों की देख-रेख में रखा गया। पूरे कमरे को उनकी तस्वीरों से सजाया गया।

कहते हैं मां-बाप को गर्भ में पल रहे बच्चों से बातें करते रहना चाहिये ताकि उनका विकास तेजी से हो सके। इस केस में मां तो थी ही नहीं। लिहाजा, इलाज के अलावा अस्पताल का स्टाफ ही बारी बारी से महिला के पास जाकर उसके पेट को सहलाता था, अजन्मे बच्चों से बातें भी करता था ताकि उन्हें मां की कमी न महसूस हो। 

सातवें महीने में डॉक्टरों ने महिला का इमरजेंसी ऑपरेशन किया और दो बेहद प्यारी जुड़वां बच्चियों की डिलीवरी कराई।

इन दोनों बच्चियों की प्री-मैच्योर डिलीवरी हुई थी। लेकिन डॉक्टरों की देख-रेख के कारण अब ये पूरी तरह स्वस्थ हैं।

इस दंपति की एक बेटी पहले से थी। दो और बेटियों के घर आ जाने से अब इनका घर खुशियों से गुलजार है। 

 

 
 

 

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