बिहार के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों के साथ पैरामेडिकल स्टॉफ की भी कमी…

बिहार के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों के साथ पैरामेडिकल स्टॉफ की भी कमी है. मुजफ्फरपुर में इंसेफेलाइटिस से बच्चों की हो रही मौत के पीछे स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली प्रमुख वजह है. एक तो रोग से बचने के लिए स्वास्थ्य महकमे की ओर से पर्याप्त जागरूकता नहीं फैलाई जा रही, दूसरे इलाज की राह में भी संसाधन रोड़ा बन रहे हैं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि ब्लॉक लेवल पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिहाज से बनाए गए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बदहाल हैं. जहां विशेषज्ञ चिकित्सकों का भारी ‘अकाल’ है. किसी खास रोग के निदान में विशेषज्ञ चिकित्सकों की भूमिका अहम होती है.

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बिहार के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 2078 पद स्वीकृत हैं, मगर 1786 ही कार्यरत हैं. इस प्रकार 292 पद खाली हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में कुल छह सौ विशेषज्ञ डॉक्टर चाहिए, जिसमें से केवल 82 डॉक्टर मौजूद हैं. इस प्रकार देखें तो 518 विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है. बाल रोग, सर्जरी, प्रसूति एवं स्त्री रोग आदि से जुड़े चिकित्सक विशेषज्ञों की श्रेणी में आते हैं. पीएचसी और सीएचसी में 1738 नर्सिंग स्टॉफ की कमी है.

सरकार ने बताया- कैसे दूर किया जा रहा डॉक्टरों का संकट

केंद्र सरकार ने हाल में संसद में बताया कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है. फिर भी चिकित्सकों संख्या बढ़ाने के लिए  कई कदम उठाए हैं. सभी एमडी, एमएस पाठ्यक्रमों के लिए शिक्षकों और विद्यार्थियों के अनुपात को 1:1 के अनुपात से बढ़ाकर 1:2 तथा रेडियोथेरेपी, फॉरेंसिक मेडिसिन, सर्जिकल, मनोविज्ञान आदि विषयों में इस अनुपात को बढ़ाकर 1:3 कर दिया गया है. एमबीबीएस स्तर पर प्रवेश की अधिकतम क्षमता को 150 से बढ़ाकर 250 कर दिया गया. नए मेडिकल कलेजों की स्थापना के मानकों में छूट भी दिया जा रहा है. वहीं मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसर्स के कार्यरत रहने की उम्र सीमा 70 वर्ष तक की गई है. रिटायरमेंट के बाद भी चिकित्सकों की नियुक्ति की व्यवस्था है.

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