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बाइज्‍जत बरी हुए AAP के 20 विधायक, भंवर में फंस चुके हैं कई माननीय

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों की सदस्यता अब खतरे में नहीं है। दिल्‍ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले काे निरस्‍त करते हुए इस मामले में दोबारा देखने का कहा है। ऐेसे में जाहिर है कि लगातार मुसिबतों से घिरी केजरीवाल सरकार ने राहत की सांस जरूर ली होगी। आइए जानते हैं आखिर क्‍या है पूरा मामला। क्‍या है फसाद की जड़। दरअसल, लाभ का पद में फंसे अाप के 20 विधायकों का यह पहला मामला नहीं है, बल्कि इस कानून की भंवर में पहले भी कई दिग्‍गज फंस चुके हैं।

बाइज्‍जत बरी हुए AAP के 20 विधायक, भंवर में फंस चुके हैं कई माननीयआखिर क्या है कानून

संविधान का अनुच्छेद 102 (1) (a) और 191(1) (a) कहता है कि संसद या फिर किसी विधानसभा का कोई भी सदस्य अगर लाभ के किसी भी पद पर होता है, उसकी सदस्यता जा सकती है। यही नहीं दिल्ली एमएलए (रिवूमल ऑफ डिसक्वालिफिकेशन) एक्ट 1997 के अनुसार भी संसदीय सचिव को भी इस लिस्ट से बाहर नहीं रखा गया है। मतलब साफ है कि इस एक्ट के आधार पर इस पद पर होना ‘लाभ का पद’ माना जाता है। दिल्ली के किसी भी कानून में संसदीय सचिव का उल्लेख नहीं है, इसीलिए विधानसभा के प्रावधानों में इनके वेतन, भत्ते सुविधाओं आदि के लिए कोई कानून नहीं है।

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BJP ने की थी शुरुआत

दिल्ली में संसदीय सचिव पद की शुरुआत सबसे पहले भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री साहब सिंह वर्मा ने की थी। वर्मा ने एक संसदीय सचिव पद की शुरुआती की, लेकिन इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस की शीला दीक्षित ने इसे बढ़ाकर तीन कर दिया। कांग्रेस और भाजपा ने आपसी तालमेल के कारण इस पद की वैधता पर कभी सवाल नहीं उठाए। लेकिन आम आदमी पार्टी ने पिछली कांग्रेस सरकार से सात गुना ज्यादा, 21 संसदीय सचिवों की नियुक्ति कर इस पूरे विवाद को जन्म दिया।

पहले भी मच चुका है बवाल

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1- यह पहली दफा नहीं है लाभ का पद को लेकर बवाल मचा है। इससे पहले भी कई बार यह मुद्दा उठ चुका है। देश में लाभ के पद का पहला मामला 1915 में तब आया जब कलकत्ता हाई कोर्ट में नगर निगम के प्रत्याशी के चुनाव को चुनौती दी गई थी।

2- 2001 में शिबू सोरेन को झारखंड में स्वायत्त परिषद के सदस्य होने के कारण राज्य सभा सांसद पद से अयोग्य घोषित कर दिया गया था और जया बच्चन को राज्यसभा सांसद के साथ उत्तर प्रदेश में लाभ का पद लेने के आरोप पर अयोग्य घोषित किया गया।

3- अनिल अंबानी को भी राज्यसभा सदस्यता से त्याग-पत्र देना पड़ा था। 2004 में राष्ट्रीय सलाहकार समिति (एनएसी) के चेयरपर्सन बनने के बाद सोनिया गांधी को भी लाभ के पद की शिकायत होने पर 2006 में संसद से त्यागपत्र देकर दोबारा चुनाव लड़ना पड़ा।

क्या मानती है दिल्ली सरकार

लाभ के पद मुद्दे पर मचे बवाल के बाद दिल्ली सरकार की तरफ से कहा गया कि विधायकों को संसदीय सचिव बनाने के बाद भी उन्हें किसी प्रकार का कोई आर्थिक लाभ नहीं दिया गया। लेकिन जनहित याचिका दायर करने वाले प्रशांत पटेल का कहना है कि केजरीवाल के विधायकों को इसके लिए न सिर्फ कमरे और ऑफिस स्टॉफ मिले हैं बल्कि पैसे भी दिए जाते हैं।

…बाइज्‍जत बरी होने तक

1- 13 मार्च 2015 को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त करने का आदेश पास किया।

2- 19 जून 2015 को वकील प्रशांत पटेल ने विधायकों को संसदीय सचिव बनाने के फैसले को चुनौती देते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से इनको अयोग्य घोषित करने की मांग की।

3- 24 जून 2015 को दिल्ली विधानसभा में संसदीय सचिव का बिल पास किया गया।

4- 13 जून 2016 को राष्ट्रपति ने बिल पर अपनी सहमति देने से इन्कार किया।

5- 25 जून 2016 को केंद्र सरकार ने संसदीय सचिव नियुक्ति समेत दिल्ली सरकार के 14 बिल वापस किए।

6- 14-21 जुलाई 2016 को चुनाव आयोग ने आप विधायकों को सुनवाई की तारीख दी।

7- 8 सितंबर 2016 को चुनाव आयोग ने दिल्ली सरकार की नियुक्ति के आदेश को रद कर आप विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया।

8- जनवरी 2017 को राजौरी गार्डन से आप विधायक जरनैल सिंह ने इस्तीफा दिया। इसके बाद संसदीय सचिव बनाए गए विधायकों की संख्या 20 हो गई।

9- 24 जून 2017 को चुनाव आयोग ने आप विधायकों की लाभ का पद मामला समाप्त करने से संबंधित याचिका खारिज की।

10- अगस्त 2017 को इस माह आप विधायक चुनाव आयोग के 24 जून के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचे थे।

11- 9 अक्टूबर 2017 को चुनाव आयोग ने आप विधायकों का जवाब जानने के लिए नोटिस जारी किया।

12- 19 जनवरी 2018 को चुनाव आयोग ने रिपोर्ट भेज आप विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की राष्ट्रपति से सिफारिश की।

13- 20 जनवरी 2018 को राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग की सिफारिश को मंजूरी दी।

14- 24 जनवरी 2018 काे आप विधायकों ने केंद्र सरकार की अधिसूचना को रद करने की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

15- 28 फरवरी 2018 को हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा ।

16- 23 मार्च 2018 को हाई कोर्ट ने केंद्र की अधिसूचना को रद कर चुनाव आयोग को नए सिरे से मामले में सुनवाई करने का आदेश दिया ।

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