पेट की आग सोशल डिस्टेंसिंग नहीं जानती

 

न्यूज डेस्क
मंगलवार रात को पूरे देश में लॉकडाउन कर दिया गया। पूरा भारत ठहर गया। लोग घरों में खुद को बंद कर लिए। दुकानों और फैक्ट्रियों में ताला लग गया और सड़के सूनी हो गई, लेकिन बुधवार को देश की कुछ सड़कों पर एक अलग ही नजारा दिखा। सोशल डिस्टेंसिंग बनाने और लक्ष्मण रेखा पार न करने की पीएम मोदी की अपील धरी की धरी रह गई। खाली जेब हाथों में झोला थामे नंगे पैर अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ दूसरों राज्यों में फंसे हजारों मजदूर पैदल ही अपने गांव के लिए निकल पड़े। कोई अहमदाबाद से बिहार के लिए निकला है तो कोई दिल्ली से गोरखपुर के लिए। सोशल मीडिया में आई ये तस्वीरे झकझोर देने वाली  हैं।

 
देश में कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए सरकार ने 21 दिनों का लॉकडाउन लागू किया हुआ है। लॉकडाउन लागू होते ही देश के कोने-कोने से ऐसी तस्वीरें आईं हैं जिसमें लोग भूख और प्यास से तड़प रहे हैं। प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौटने को बेताब हैं। कोलकाता, दिल्ली, गुजरात, पंजाब के शहरों में रोजगार की तलाश में आए ये लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के अपने गांव की तरफ बढ़ चले हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे कब अपनी मंजिल पर पहुंचेंगे। बस उन्हें इतना पता है कि चलते जाना है। इन गरीब मजदूरों को न तो पुलिस की लाठी का डर है और न ही कोरोना का। उन्हें सूनसान सड़कों से भी खौफ नहीं हो रहा। वह बस हर हाल में अपने गांव, अपने लोगों के बीच पहुंचना चाहते हैं।

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लॉकडाउन ने दिहाड़ी मजदूरों की कमर तोड़ दी है। रोज खाना कमाने वाले अब सरकारी इंतजामों पर निर्भर हैं। लॉकडाउन के बाद बेघर और बिना काम वाले लोग एक वक्त की रोटी के लिए लंबी-लंबी कतार लगाए बैठ गए। पेट की आग ऐसी कि वे सोशल डिस्टेंसिंग क्या होती है यह भी नहीं जानना चाहते। सोशल मीडिया पर तमाम ऐसी तस्वीरे और वीडियो आए हैं जिसमें लोग खाने के पैकेट के लिए धक्का-मुक्की कर रहे हैं। ऐसे तस्वीर से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोरोना वायरस ताकतवर है या पेट की आग।

 
सोशल मीडिया में ही आई एक वीडियो में एक महिला रोती-बिलखती हुई कह रही है कि भूख से मरने से बेहतर है कि कोरोना से मर जाएं। इस महिला की तरह कई गरीब मजदूर यह बात कहते हुए दिखे। वे तर्क देते हुए कह रहे हैं कि कोरोना होगा तो कम से कम उनका इलाज होगा और उन्हें कुछ खाने को भी मिलेगा।

थोड़ा और आगे बढ़ते हैं। कोरोना वायरस से बचने के लिए हैंड सैनेटाइडर और मास्क लगाने की सलाह दी जा रही है। बार बार कहा जा रहा है कि साबुन और पानी से दिन में कई बार हाथ धोया जाए, लेकिन इस देश में कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनके पास पीने के लिए भी स्वच्छ पानी नहीं है। मास्क, सेनेटाइजर तो दूर गरीबों को प्यास बुझाने के लिए पानी भी नसीब नहीं हो रहा। ऐसे हालात में देश में कोरोना वायरस संक्रमण रोकने की बात करना बेमानी सा लगता है।

फिलहाल कोरोना ने गरीबों को वहीं पहुंचा दिया है जहां से वे चले थे। जो कभी गांवों और कस्बों से निकलकर शहरों में रोजगार की तलाश में आए थे, वह आज एक वायरस के कारण उसी हालात में वापस आ चुके हैं। उनकी कहानी जहां से शुरू हुई थी लौटकर वहीं आ गई है। आंखों में सपने लेकर गांवों से शहरों में आए लोग पैदल या ट्रक का सहारा लेकर लौट रहे हैं। वे भूखे हैं…प्यासे हैं।

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