पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन, शोक में डूबा पूरा देश

नई दिल्ली: भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज निधन हो गया। 93 वर्षीय अटल ने गुरुवार को एम्स में आखिरी सांस ली। वह लंबे समय से बीमार थे और उनकी सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा था। अटल 2009 से ही व्हीलचेयर पर थे। पिछले दो दिनों से पूरे देश में उनकी बेहतर सेहत के लिए दवाओं औऱ दुआओं का दौर चल रहा था। लेकिन दोनों ही वक्त को मात नहीं दे सके। राजनीति के ‘अटल’ कहे जाने वाले वाजपेयी के देहांत की खबर के बाद से ही पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गयी है।

 

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन, शोक में डूबा पूरा देश

अटल बिहारी वाजपेयी का निधन

 

राजनीति से ले चुके थे सन्यास

अटल बिहारी वाजपेयी पिछले 13 वर्षों से राजनीति से पूरी तरह दूर थे और सार्वजनिक तौर पर इस बीच कभी भी कैमरे के सामने नहीं आये। हालांकि उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि जब भी भाजपा की उपलब्धि की बात आती है, तो वाजपेयी ही याद आते। वह हिंदू मुखर के प्रबल दावेदार माने जाते थे, लेकिन आपको जानकर शायद आश्चर्य हो कि वह कभी वामपंथ के साथ चले थे।

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्में

दरअसल, 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म हुआ। अटल के पिता का नाम कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां कृष्णा देवी हैं। राजनीति में वाजपेयी की शुरुआत 1942-45 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में हुई थी। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और जनसंघ का साथ पकड़ने से पहले वाजपेयी कुछ समय तक साम्यवाद के संपर्क में भी आए।

वामपंथ से की थी शुरुआत

वाजपेयी ने कम्युनिस्ट के रूप में शुरुआत की, लेकिन हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता के लिए साम्यवाद को छोड़ दिया। अटल ने 1950 के दशक की शुरुआत में आरएसएस की पत्रिका को चलाने के लिए कानून की पढ़ाई बीच में छोड़ दी। बाद में उन्होंने आरएसएस में अपनी राजनीतिक जड़ें जमाईं और बीजेपी की उदारवादी आवाज बनकर उभरे। 1951 से भारतीय राजनीति का हिस्सा बने। उन्होंने 1955 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा था लेकिन हार गए थे। इसके बाद 1957 में वह सांसद बनें। वह पहली बार 1957 में संसद सदस्य चुने गए थे।

बीजेपी की स्थापना में निभाई अहम भूमिका

अटल बिहारी वाजपेयी ने 90 के दशक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। यह वाजपेयी के व्यक्तित्व का ही कमाल था कि बीजेपी के साथ उस समय नए सहयोगी दल जुड़ते गए, जबकि उन दिनों बाबरी मस्जिद विध्वंस के और दक्षिणपंथी झुकाव के कारण बीजेपी को राजनीतिक अछूत माना जाता था।

10 बार लोकसभा सांसद रहे

अटल बिहारी वाजपेयी कुल 10 बार लोकसभा के सांसद रहे। इस दौरान वह दो बार 1962 और 1986 में राज्यसभा के सांसद भी रहें। अटल ने उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली और मध्य प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते। वहीं वह गुजरात से राज्यसभा पहुंचे थे।

पीएम कार्यकाल में दो बार गिरी थी सरकार

बीजेपी के चार दशक तक विपक्ष में रहने के बाद वाजपेयी 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन त्रिशंकु लोकसभा होने के चलते सरकार महज 13 दिन में ही गिर गई। आंकड़ों ने एक बार फिर वाजपेयी के साथ लुका-छिपी का खेल खेला और स्थिर बहुमत नहीं होने के कारण 13 महीने बाद 1999 की शुरुआत में उनके नेतृत्व वाली दूसरी सरकार भी गिर गई। लेकिन 1999 के चुनाव में वाजपेयी पिछली बार के मुकाबले एक अधिक स्थिर गठबंधन सरकार के मुखिया बने, जिसने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

गठबंधन की राजनीति से हुए थे दुखी

गठबंधन की राजनीति के चलते दो बार वाजपेयी की सरकार गिरी। इस दौरान उन्होंने संसद में भावुक भाषण देते हुए विपक्ष की हंसी पर कटाक्ष किया था। गंठबंधन की मजबूरियों के चलते ही बीजेपी को अपने मूल मुद्दों को पीछे रखना पड़ा। इन्हीं मजबूरियों के चलते जम्मू-कश्मीर से जुड़े अनुच्छेद 370, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने और समान नागरिक संहिता लागू करने जैसे उसके चिरप्रतीक्षित मुद्दे ठंडे बस्ते में चले गए।

परमाणु परीक्षण के फैसले से दुनिया को चौंकाया

11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट कर अटल बिहारी वाजपेयी ने सभी को चौंका दिया। यह भारत का दूसरा परमाणु परीक्षण था। इससे पहले 1974 में पोखरण 1 का परीक्षण किया गया था। दुनिया के कई संपन्न देशों के विरोध के बावजूद अटल सरकार ने इस परीक्षण को अंजाम दिया, जिसके बाद अमेरिका, कनाडा, जापान और यूरोपियन यूनियन समेत कई देशों ने भारत पर कई तरह की रोक भी लगा दी थी जिसके बावजूद अटल सरकार ने देश की जीडीपी में बढ़ोतरी की। पोखरण का परीक्षण अटल बिहारी वाजपेयी के सबसे बड़े फैसलों में से एक है।

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