पर्यावरण मसौदे के खिलाफ पूर्वोत्तर में क्यों हो रहा है विरोध?

जुबिली न्यूज डेस्क
वैसे तो केंद्र सरकार के पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए), 2020 के मसौदे की चारों ओर से आलोचना हो रही है, पर पूर्वोत्तर भारत में लगातार और सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है।
पूर्वोंत्तर में सबसे ज्यादा विरोध का कारण यह है कि इस कानून का सबसे ज्यादा असर देश के इसी इलाके में पड़ेगा।
इस मसौदे का अंग्रेजी नाम ‘एनवायरंमेंट इंपैक्ट असेसमेंट’ है। केंद्र सरकार ने इस मसौदे को आम लोगों की प्रतिक्रिया के लिए पेश किया था। पर्यावरण मंत्रालय को प्रतिक्रिया भेजने की अंतिम तारीख 11 अगस्त थी।
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पूर्वोत्तर में तमाम संगठन इसके खिलाफ आंदोलन की राह पर हैं। कई नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार को पत्र भी भेजा है।
असम के तमाम संगठनों ने दलील दी है कि नए कानून का इलाके के पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ेगा। ये लोग बाघजान में तेल के कुएं में लगी आग और पाटकाई इलाके में कोयला खनन की नई परियोजना को मंजूरी दिए जाने से अब कोई भी खतरा मोल नहीं लेना चाहते।
पर्यावरणविदों का कहना है कि इस मसौदे के पारित होने के बाद किसी भी परियोजना को पर्यावरण के लिहाज से मंजूरी देने में आम लोगों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी लगभग खत्म हो जाएगी।
असम में तेल कुओं में आगक्यों हो रहा है विरोध
सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या है इस मसौदे में कि पूर्वोत्तर के तमाम संगठन इसका मुखर विरोध क्यों कर रहे हैं। दरअसल इसकी बड़ी वजह इस इलाके का संवेदनशील पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र है।
इन संगठनों का कहना है कि इस मसौदे के कानून में बदलने के बाद किसी परियोजना को हरी झडी दिखाने से पहले उसमें आम लोगों की भागीदारी और उनकी राय की अहमियत बहुत कम हो जाएगी।
पर्यावरण संबंधी परियोजनाओं को मंजूरी के पहले परियोजना से पर्यावरण पर पडऩे वाले प्रभाव की आकलन रिपोर्ट पेश करनी पड़ती है, लेकिन बीते वर्षों में तमाम ऐसे मामले सामने आए हैं जहां कंपनियों को न सिर्फ मंजूरी मिलती है बल्कि उनको जवाबदेहियों से भी मुक्त किया जाता रहा है।
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क्या है मसौदे में
जानकारों के मुताबिक केंद्र की ओर से पेश इस नए मसौदे में सार्वजनिक परामर्श के बिना ही अंतरराष्ट्रीय सीमा के सौ किमी के दायरे में उद्योगों की स्थापना का प्रस्ताव है। इसका असर इलाके के तमाम राज्यों पर पडऩा तय है। उद्योगों की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर जमीन की जरूरत होगी और नतीजतन विस्थापन तेज होगा। इससे पर्यावरण, पारिस्थितिक तंत्र और संस्कृति को जो नुकसान होगा उसकी भरपाई लगभग असंभव होगी।
ईज आफ डूइंग बिजनेस के नाम पर केंद्र सरकारें हर साल ईआईए अधिसूचना में संशोधन कर विभिन्न परियोजनाओं अथवा उद्योगों को इसके दायरे से बाहर करने के प्रयास करती रही है। ताजा मसौदे में ऑनशोर और ऑफशोर तेल व गैस ड्रिलिंग से जुड़ी तमाम गतिविधियों को बी-2 श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। नए कानून के मुताबिक अब इस वर्ग में शामिल परियोजनाओं को किसी भी तरह की इनवायरनमेंट क्लीयरेंस रिपोर्ट की जरूरत नहीं होगी।
इसी सब को देखते हुए असम में इसका विरोध हो रहा है। राज्य में हाल में ऐसी कुछ घटनाएं हो चुकी हैं जिनका पर्यावरण पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ा है। इसकी वजह से जान-माल का नुकसान तो हुआ ही है, विस्थापन भी तेज हुआ है।
इस साल मई में असम के तिनसुकिया के बाघजान तेल कुएं में भयानक आग की घटना में दो लोगों की जान गई और सात हजार से ज्यादा लोगों को विस्थापित होना पड़ा। वहीं डिब्रू-साइखोवा नेशनल पार्क को भारी नुकसान पहुंचा।
करीब साढ़े छह सौ वर्ग किलोमीटर में फैले इस नेशनल पार्क और उससे सटे मागुरी मोटापुंग बील क्षेत्र की गिनती पर्यावरण के लिहाज से अति-संवेदनशील इलाकों में की जाती है। यह दुनिया के 35 सबसे संवेदशनशील बायोस्फेयर रिजर्व में शामिल है।

नेता भी कर रहे हैं विरोध
असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से लेकर, विधानसभा में विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया और मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा तक ने ईआईए मसौदे के खिलाफ केंद्र को पत्र भेज कर कड़ा विरोध जताया है।
विधानसभा में विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया ने पर्यावरण मंत्रालय को अपने पत्र में लिखा है, “यह मसौदा पर्यावरण दोहन से आदिवासी समुदायों को होने वाले नुकसानों को दरकिनार करते हुए आदिवासी समुदायों को उनकी ही जमीन से उनके अधिकार को छीनता है। असम जैसे पर्यावरण के लिहाज से अति-संवेदनशील इलाके में पोस्ट-फैक्टो यानी काम शुरू होने के बाद मंजूरी देना एक बेमतलब और नुकसानदेह कदम है।”

मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा ने केंद्र सरकार से यह मसौदा वापस लेने का अनुरोध किया है। उन्होंने दलील देते हुए कहा है कि नया कानून परियोजनाओं की एक लंबी सूची को सार्वजनिक परामर्श के दायरे से बाहर करता है। कानून बन जाने पर सीमावर्ती इलाकों में सड़क और पाइपलाइन जैसी परियोजनाओं के लिए किसी भी सार्वजनिक सुनवाई की जरूरत नहीं होगी। इसका पूर्वोत्तर के ज्यादातर हिस्से पर प्रतिकूल असर होगा। यह देश के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले इलाकों में शामिल है।
असम के अलावा पड़ोसी अरुणाचल प्रदेश ने भी मसौदे का विरोध शुरू कर दिया है। अब तक केंद्र की तमाम सरकारें इस राज्य को पनबिजली का सबसे बड़ा स्त्रोत मानते हुए इसके दोहन में लगी रही हैं। नतीजतन पर्यावरण नियमों की अनदेखी कर दर्जनों बांधों और बिजली परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाई जा चुकी है। उसका खामियाजा अब इलाके के लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

 

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