नाग पंचमीः जानिए, क्या है नागों की शक्ति का राज, कैसे बने शिव का श्रृंगार और विष्णु की शैय्या

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सावन के महीने में शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देशभर में अलग-अलग तरीकों से नागदेवता को खुश करने का प्रयास किया जाता है। भविष्य पुराण में कहा गया है कि नागपंचमी के दिन धान के लावा और दूध अर्पित करने से नागों की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आइए, जानें जिन नागों को देवतुल्य बताया गया है उनकी उत्पत्ति के बारे में कौन-सी धार्मिक कथाएं हैं…नाग पंचमीः जानिए, क्या है नागों की शक्ति का राज, कैसे बने शिव का श्रृंगार और विष्णु की शैय्या

नागों की उत्पत्ति की यह भी है कथा
श्रीश्वेतवाराह कल्प (शास्त्रों के वर्गीकरण के अनुसार वर्तमान युग) की एक पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि सृजन के आरंभ में ही किसी कारणवश ब्रह्माजी बहुत क्रोधित और फिर भावुक हो गए। इस कारण उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली। ब्रह्माजी के ये आंसु जब पृथ्वी पर गिरे तो मिट्टी के साथ इनके मेल से नागों की उत्पत्ति हुई। इन नागों में वासुकि, तक्षक,अनंत, कर्कोटक, पद्म, महा महापद्म, शंखपाल प्रमुख हैं।

इसलिए हैं नाग देवताओं जितने शक्तिशाली
अपने आंसुओं से उत्पन्न होने के कारण ब्रह्माजी ने नागों को अपना पुत्र माना और इन्हें देवताओं के समान शक्तियां दीं। अनंतनाग को सूर्य के समान, वासुकि को चंद्रमा के समान, तक्षक को मंगल, कर्कोटक बुध के समान,पद्म को बृहस्पति, महापद्म को शुक्र और कुलिक तथा शंखपाल को शनि के समान शक्तिशाली बनाया।

धार्मिक मान्यता और नाग
धार्मिक मान्यता है कि ये सभी नाग सृष्टि संचालन में ग्रहों के समान ही भूमिका निभाते हैं। इन नागों से देवतागण सेवा भी लेते हैं। जैसे, भगवान गणपति नागों से यज्ञोपवीत के रूप में सेवा लेते हैं। वहीं, भगवान शिव श्रृंगार के रूप में सेवा लेते हैं तो भगवान विष्णु सैय्या के रूप में शेषनाग की सेवा लेते हैं।

वैदिक ज्योतिष और नाग
वैदिक ज्योतिष में राहु को काल और केतु को सर्प माना गया है। इसलिए कहा जाता है कि नागों की पूजा करने से व्यक्ति की कुंडली के राहु और केतु दोष शांत होते हैं। कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। धार्मिक मान्यता है कि शेषनाग के रूप में ये नाग ही हैं जो पृथ्वी को अपने फन पर उठाए हुए हैं।

नागों की पूजा और संस्कृति
आज भी देश के गांवों में नागों की पूजा करने के लिए गाय के गोबर से प्रतीकात्मक नाग की आकृतियां बनाई जाती हैं। नागों को धन की देवी लक्ष्मी का अनुचर माना जाता है। इसलिए कहते हैं कि जहां नागों का वास रहता है, वहां देवी लक्ष्मी अवश्य रहती हैं। नागों की पूजा से आर्थिक तंगी दूर होती है, ऐसी धार्मिक आस्था है।

नाग पूजा का मंत्र और विधि
किसी भी शिवमंदिर में प्राण प्रतिष्ठित शिवलिंग के ऊपर लगे नाग की पूजा की जा सकती है। शिवलिंग पर जल और दूध अर्पित करने के बाद नाग के ऊपर भी जल और दूध अर्पित करें और धान के लावा का भोग लगाएं। नाग पूजा करते समय ‘नमोsस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथ्वी मनु! ये अंतरिक्षे ये दिवि तेभ्य: सर्पेभ्यो नम:।’ इस श्लोक का उच्चारण करना लाभप्रद रहता है। इसका अर्थ है- जो नाग पृथ्वी, आकाश, सूरज की किरणों, सरोवर, कुएं और तालाब में रहते हैं। वे सभी हम पर प्रसन्न हों। हम उन्हें बारंबार नमन करते हैं।

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