नई शिक्षा नीति: एक विश्लेषण – रघु ठाकुर

रघु ठाकुरदेश में नई शिक्षा नीति के दस्तावेज़ पर चर्चा चल रही है हालाकि यह चर्चा बहुत सामान्य स्तर पर है, यानी कुछ शिक्षा जगत से जुड़े लोगों और बुद्धिजीवियों के बीच में ही इस पर चर्चा हो रही है। चूंकि रपट अंग्रेजी भाषा में है अतः वह आम भारतीय के विमर्श से पहले ही बाहर है।
यह शिक्षा नीति पर आजादी के बाद का चौथा प्रस्ताव है। शिक्षा नीति का पहला दस्तावेज़ 1968 में डी.एस. कोठारी के द्वारा पेश किया गया था जिसे आम बोल चाल में लोग कोठारी कमीशन बोलते है। प्रो. कोठारी के शिक्षा नीति के दस्तावेज़ के आधार पर कुछ कदम भी भारत सरकार ने उठाए थे और विशेषतः राष्ट्रभाषा हिन्दी और भारतीय भाषाओं को महत्व मिला था। जिसके बाद लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भारतीय भाषा वालों को कुछ स्थान मिलना शुरू हुआ इस कारण से ग्रामीण एवं कस्बाई विशेष तौर से हिन्दी और अन्य भारतीय भाषा वाले प्रत्याशियों की हिस्सेदारी बढ़ी। शिक्षा नीति के दस्तावेज़ पर उस समय यानी 60 के दशक में चल रहे डा.लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का अप्रत्यक्ष और अघोषित प्रभाव था। डा.लोहिया ने 60 के दशक में अंग्रेजी की सत्ता और उसकी मानसिक दासता से मुक्ति का अभियान चलाया था। उनका नारा था ‘‘जन-जन की है, अभिलाषा चले देश में देशी भाषा’’। लोहिया अंग्रेजी को हटाकर भारतीय भाषाओं को प्रयोग में लाने के पक्षधर थे। वे चाहते थे कि राज्यों में क्षेत्रीय भाषाएं चले और केन्द्र में हिन्दी। वे अंग्रेजी के ज्ञान के पक्ष में थे परन्तु अनिवार्यता के पक्ष में नहीं थे।
उसके बाद 1986 में भी एक शिक्षा नीति का दस्तावेज़ प्रस्तुत हुआ यद्यपि उसके आधार पर कोई उल्लेखनीय कदम तत्कालीन सरकार द्वारा नहीं उठाए गए। 1992 में भी कुछ संशोधन सहित शिक्षा नीति का दस्तावेज़ सामने आया परन्तु वह भी लागू नहीं हो सका। और उसके बाद अब 2020 में श्री कस्तूरी रंगन कमेटी के द्वारा नई शिक्षा नीति (एन.ई.पी.) का दस्तावेज़ भारत सरकार को सौंपा गया है। यद्यपि यह अभी दस्तावेज़ ही है और जब तक इसके प्रावधानों के आधार पर भारत सरकार यानी मंत्रीमंडल वर्तमान कानूनों में बदलाव नहीं करता है, तब तक यह एक सदुपदेश के कागज जैसा है।
श्री कस्तूरी रंगन इसरो के मुखिया रहे है एवं बड़े वैज्ञानिक है। और कई केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी रहे है। यह दस्तावेज़ वर्तमान सरकार के राजनैतिक और मूल विचारों की छाया से ज्यादा प्रभावित नज़र नहीं आता इसलिए इस दस्तावेज़ पर उस ढंग का रंग देने का कोई आरोप नहीं लग सका। यह अच्छी बात है। परन्तु भारत सरकार इसे लागू करेगी या नहीं? किस रूप में करेगी? कितना करेगी? यह सब प्रश्न अभी अनुत्तरित है। परन्तु जो मुद्दे नीति के दस्तावेज़ में रखे गए है उनके प्रभाव और संभावनाओं पर चर्चा की जाना चाहिए।
दस्तावेज़ में कहा गया कि जो दो करोड़ छात्र स्कूल छोड़ देते है उन्हें वापस लाना चाहिए। इस वापसी के लिए उन्होंने एक सुझाव यह दिया है कि स्कूली बच्चों को मध्यान्ह भोजन के साथ पौष्टिक नाश्ता भी दिया जाना चाहिए। अब सरकार को यह तय करना है कि वह इसे किस प्रकार लागू करेगी। परन्तु क्या केवल पौष्टिक नाश्ते मात्र से स्कूल के बच्चे छात्र बने रहेंगे यह एक प्रश्न है, इस अकेले प्रयोग से दो करोड़ बच्चों को वापस लाना और नए ट्राप आउट को रोकना संभव नहीं है क्योंकि:-
सरकारी स्कूलों की संख्या पहले से ही अपर्याप्त है और धीरे-धीरे सरकारें सरकारी स्कूलों को बंद कर उनकी संख्या कम कर रही है। एक जानकारी के अनुसार पिछले एक दशक में लगभग एक लाख से अधिक शिक्षण संस्थाएं सरकारी या स्वायत्त संस्थाओं यथा नगर निगम, जिला पंचायतों आदि के द्वारा चलाई जा रही थी वह बंद हो चुकी है। औपचारिक तौर पर आर.टी.ई. यानी ‘‘शिक्षा का अधिकार’’ मौलिक अधिकार घोषित हो चुका है, तथा उसका कानून भी बना है। परंतु सरकारी विद्यालयों के अभाव में वह कानून विकलांग कानून है। और सबको शिक्षा के बजाय उसे शिक्षण संस्थाओं की छात्र छात्राओं के 20 प्रतिशत स्थान गरीब छात्रों को शासन या अधिकारियों की संस्तुति पर देने तक सीमित कर दिया गया है। स्थिति यह है कि, अधिकांश निजी शिक्षण संस्थायें गरीबों के बच्चों को प्रवेश देने के आदेश का पालन ही नहीं करतीं। और अधिकारी उनके विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर पाते। क्योंकि आदेश देने वालों को सीधा कोई अधिकार या मान्यता समाप्त करने की शक्ति नहीं है, बल्कि वे कार्यवाही की सिफारिश राजधानी के अधिकारियों को करते है और राजधानियां केवल राजसत्ता के दबाव से चलती है।
अच्छा होता कि श्री कस्तूरी रंगन अपनी सिफारिश में सारी स्कूली शिक्षा के निजीकरण को समाप्त कर छात्रों की संख्या के अनुकूल सरकारी शिक्षण संस्थाएं खोले जाने की सिफारिश करते तो ही आर.टी.ई. प्रभावी हो पाता तथा ड्राप आउट रूक सकता था।
3.ग्रामीण क्षेत्रों की नियति यह है कि छोटे-छोटे बच्चों को कई-कई किलोमीटर पढ़ने के लिए जाना पड़ता है। तथा बहुत सारे स्थानों पर तो स्कूल जाने के लिए न सड़के और न नदी नालों पर पुल है। और आए दिन अखबारों में फोटो छपते है कि छात्र लकड़ों-लठ्ठों पर बैठकर नदी नाले पार करते हैं। कस्तूरी रंगन कमेटी ने अगर यह भी कहा होता कि हर हाल में एक वर्ष के अंदर गाँव में स्कूल खोले जाएंगे तथा पड़ोस के स्कूल तक जाने के लिए सड़क-पुल बनाए जायेंगे, तो कुछ संभावना भी बनती। कुल मिलाकर आर्थिक रूप से समर्थ परिवारों के बच्चों के पास यह सुविधा रहेगी कि वे पढ़ सकेंगे। परन्तु देश के 30-40 करोड़ गरीबों के बच्चे कैसे पढ़ सकेंगे। इसके लिये, कोई प्रावधान इस रपट में नहीं है। गरीब माता-पिता तो वैसे भी बच्चों को पढ़ाने के बजाय, काम करने में लगा देते है। आपके पाठ्यक्रम का रूप क्या होगा? कितने-कितने वर्ष के हिस्से होंगे इन तकनीकी पहलुओं से शिक्षा का ड्राप आउट समाप्त नहीं हो सकता।
इस दस्तावेज़ में आधारभूत संरचना के शेयरिंग (मिला जुला उपयोग) का सुझाव यानी खेल मैदान, जिम आदि का दिया है। परन्तु इसे विभाजित कर तथा स्कूलों में आपस में बाँटकर उपयोग कराने का प्रावधान चिंतनीय और अव्यवहारिक है, तथा एक प्रकार से शिक्षिण संस्थाओं की दायित्व मुक्ति है। इसके कारण एक स्कूल के बच्चे दूसरे स्कूल में खेलने या जिम करने जाएंगे तो कितना समय जाएगा? किन साधनों से जाएंगे? यह समस्या है। और कुल मिलाकर यह एक अव्यवहारिक और शिक्षण संस्थाओ के मालिकों के निजी हो या सरकारी को बचाव की सुविधा प्रदान करना है।
शिक्षा नीति में एक अच्छा सुझाव है कि अब छात्र मल्टी डिसिप्लिनरी (किन्हीं भी विषयों की साथ-साथ) शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे। यानी अब कला, वाणिज्य विज्ञान विषयों की सीमा समाप्त कर कोई भी विषय किसी अन्य विद्या के विषय के साथ पढ़ा जा सकेगा। तथा छात्र अपनी योग्यता व आवश्यकता के अनुसार इन्हें आपस में बदल भी सकता है। कुछ स्थानों पर यह सुविधा अभी भी थी। जैसे कुछ वर्षो से इंजीनियरिंग के छात्र उसके साथ प्रबंधन-वाणिज्य-अर्थशास्त्र जैसे कोर्स कर रहे थे। और इससे उन्हें नौकरियों में विशेष महत्व मिलता था। हालांकि इसके पीछे कार्पोरेट जगत की आवश्यकताएं भी हैं। क्योंकि उन्हें एक वेतन में दो विधा के कर्मचारी मिल जाते है। फिर भी सिंगल डिसीप्लिन से मल्टी डिसीप्लिेन का प्रस्ताव अच्छा प्रस्ताव है।
स्कूल के शिक्षकों के वेतन और नियमों के बारे में दस्तावेज़ लगभग मौन है। हालाकि जस्टिस जे.एस.वर्मा कमेटी ने शिक्षकों को स्थायी नियुक्ति देने की सिफारिश की थी और वह भी गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लिए जरूरी है। दस्तावेज़ में नर्सरी के बच्चों को उनके मानसिक विकास और रूचि के आधार पर आगे का मार्ग बनाने की दिशा रखी है, परन्तु इसके लिए ऐसे शिक्षकों की व्यवस्था कैसे होगी इसका कोई प्रावधान नहीं है।
अगर दस्तावेज़ में डा.लोहिया की बात को विस्तार देकर शामिल किया गया होता तो बेहतर होता। डा.लोहिया कहते थे कि राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान सबको शिक्षा एक समान। और रपट में अगर यह कहा गया होता कि सबको अनिवार्य मुफ्त और उनकी योग्यतानुसार समान शिक्षा दी जाएगी तो मौलिक अधिकार भी कारगर रूप ले पाता। अगर नेताओं-उद्योगपतियों व अफसरों के बच्चे सरकारी स्कूल में गरीब के साथ पढ़ेंगे तो, शिक्षा का स्तर भी सुधरेगा व संविधान की भावना की भी पूर्ति होगी।
दस्तावेज़ में बच्चों को पाँचवी क्लास तक मातृभाषा में शिक्षा देने का प्रावधान है। परन्तु केवल भाषा का प्रावधान हैं, मीडियम का नहीं।अधिकांश निजी शिक्षण संस्थाएं अंग्रेजी मीडियम में पढ़ा रही है और अगर मीडियम में अंग्रेजी रहेगी तो फिर अंग्रेजी का प्रभुत्व भी रहेगा।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के स्थान पर कई अन्य समकक्ष संस्थाओं को बनाने का सुझाव है। यशपाल कमेटी ने भी राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के गठन का प्रस्ताव किया था। जिसका अध्यक्ष शिक्षा मंत्री हो। हालाकि इससे कोई विशेष असर पड़ने वाला नहीं है, बल्कि सरकार का शिक्षा पर नियंत्रण ही बढ़ेगा।
जब तक सबको निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान नहीं बनता तब तक आरक्षण की उपयोगिता रहेगी। परन्तु इस पर भी दस्तावेज़ मौन है।
विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुमति देने का प्रावधान सीधा-सीधा शिक्षा का विदेशीकरण और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विदेशी पूँजी निवेश है। यानी इन विदेशी उच्च शिक्षा के संस्थानों में वहीं प्रवेश ले सकेंगे जो सम्पन्न परिवार से है। और कोई सामान्य व्यक्ति के बच्चे इनमें नहीं पढ़ सकेंगे। उच्च शिक्षा की यह असमानता अवसरों की असमानता होगी।
12.मानव संसाधन विभाग कुछ दशक पहले शिक्षा विभाग ही था। अब पुनः उसका नामकरण शिक्षा विभाग करने का प्रस्ताव है। इससे जमीनी हालात पर कोई भारी असर होने वाला नहीं है, केवल भावनात्मक संतोष ही है।
दस्तावेज़ में यह अच्छा सुझाव है कि देश में शिक्षा का बजट कुल जी.डी.पी. का 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 6 प्रतिशत किया जाए। हालांकि कुछ लोग इससे इतने उत्साहित हो गए है, कि वे यह लिख और बोल रहे है कि दुनिया में सबसे ज्यादा शिक्षा का बजट भारत का होगा। यद्यपि यह एकदम निराधार है। अमेरिका का 2019-20 का बजट 4-7 ट्रिलियन डालर याने 399 करोड़ लाख डालर का है जो भारत के बजट से 60 गुने के बराबर है। और दूसरी तरफ अमेरिका की आबादी लगभग 30 करोड़ है यानी भारत की 130 करोड़ आबादी का एक चौथाई से भी कम। अमेरिका जो अपने बजट का 5 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है। अगर उनके शिक्षा बजट को आबादी के हिसाब से बाँटा जाए तो औसतन दस लाख रूपया प्रति व्यक्ति उनका शिक्षा का खर्च है और भारत के शिक्षा के बजट 94 हज़ार करोड़ रूपये को अगर 130 करोड़ से बांटा जाए तो मुश्किल से 323 रूपया प्रति व्यक्ति खर्च होता है। तथा अगर कुल बजट को भी बाँटा जाए तो भी मुश्किल से 5-6 हज़ार रूपये प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष शिक्षा का खर्च भारत में आयेगा। अतः ऊपरी तौर पर तो हम अपनी पीठ ठोक सकते है कि हम 6 प्रतिशत खर्च करेंगे हालांकि अभी तो मात्र 3 प्रतिशत ही है। परन्तु यह याद रखना होगा कि 6 प्रतिशत खर्च करके भी भारत मात्र 325 रूपया प्रति व्यक्ति शिक्षा पर खर्च करेगा और अमेरिका 10 लाख रूपया प्रति व्यक्ति। लगभग यही स्थिति ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की भी है।
भारत सरकार से हमारी अपील है कि:-
सबको सम्पूर्ण निशुल्क समान अनिवार्य और योग्यता या दिलचस्पी के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था का कानून बनायें।
हिन्दी और मातृ भाषा को अनिवार्य करे तथा अंग्रेजी को ऐच्छिक विषय बनाए।
विदेशी विश्वविद्यालयों के ऊपर रोक लगाए। क्योंकि विश्वविद्यालय शिक्षा रोजगार व्यापार और सभ्यता के वाहक होते है। और पूँजी के मालिकों के अनुरूप ही नागरिक गढ़ते है।
आजादी के पहले अंग्रेजी शिक्षा मेकाले ने अंग्रेजी साम्राज्य के दास और बाबू बनाने के लिये तैयार की थी और अब विदेशी विश्वविद्यालयों की शिक्षा कोरपोरेट जगत की जरूरत पूरी करने के लिये उपयुक्त कर्मचारी बनाने की होगी। जिसमें, नैतिक जीवन मूल्य आदि नहीं होंगे।
 
सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर देश के जाने माने समाजवादी चिन्तक है।प्रख्यात समाजवादी नेता स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संस्थापक भी है।  
 

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