दूसरों के बारे में बुरा सोचकर आप इस तरह करते हैं अपना नुकसान

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मानवता उन लोगों की कद्र करती है जो अपने क्रोध को काबू में रखते हैं और हिंसा से दूर रहते हैं। शांति के लिए व्यक्तिगत प्रयासों का सम्मान करने हेतु विभिन्न धार्मिक, नागरिक और सामाजिक वर्गों द्वारा बहुत से पुरस्कार भी दिए जाते हैं। रूहानियत के बुनियादी उसूलों में अहिंसा एक है। प्रभु के साम्राज्य में प्रवेश के लिए यह जरूरी है कि हम किसी भी जीव को नुकसान न पहुंचाएं। न मन से, न वचन से और न कार्यों से।

यदि हम गहराई से आत्म-निरीक्षण करें तो पाएंगे कि हम दिन में कई बार दूसरों का बुरा सोचते हैं। हममें से बहुतों की दूसरों का बुरा सोचने की आदत होती है। चाहे हम वास्तव में कोई बुरा कार्य न करें, पर हो सकता है कि हम दूसरों के लिए दुर्भाग्य की कामना करें। कुछ लोग इच्छा रखते हैं कि औरों का नुकसान हो जाए या वे दुर्घटनाग्रस्त हो जाएं। कुछ लोग चाहते हैं कि दूसरे कंगाल हो जाएं, अपनी धन-संपत्ति गंवा दें। कई बार हम कामना करते हैं कि सामने वाला अपने लक्ष्य में नाकाम हो जाए ताकि हमारी लक्ष्य को प्राप्त करने की संभावना बढ़ जाए। अगर हम किसी और से ईर्ष्या रखते हैं तो हम उनके लिए दुर्भाग्य और अपने लिए सौभाग्य की कामना करते हैं।

इस बुराई का इलाज है कि हम हर एक को एक ही बड़े परिवार का सदस्य मानें। ऐसा कोई बिरला ही होगा जो अपने परिवार के सदस्यों, जैसे अपने मां-बाप और अपने बच्चों के लिए दुर्भाग्य की कामना करे। अगर अपने परिवार के प्रति अपने प्रेम को हम पूरी सृष्टि तक ले जाएं तो इससे दूसरों का बुरा सोचने की हमारी प्रवृत्ति को रोकने में सहायता मिलेगी।

विचारों से हिंसा करने का एक और तरीका है- दूसरों की मन ही मन आलोचना करना। अगर हम दिन भर में अपने मन में उठने वाले विचारों पर ध्यान दें तो पाएंगे कि हम अपने से मिलने वाले अधिकतर इंसानों की मन ही मन कितनी आलोचना करते हैं। जब कुछ ऐसा होता है जो हमारी पसंद का नहीं होता तो हम उनके बारे में भी बुरा सोचने लगते हैं जिन्हें बेहद प्यार करते हैं।

हम लोग यह नहीं जानते कि विचार कितने शक्तिशाली होते हैं। हमारे अच्छे-बुरे विचारों से ऐसी तरंगें निकलती हैं जो सामने वाले इंसान पर असर डालती हैं। चाहे हम यह सोचें कि हमारे विचार और भावनाएं गुप्त हैं, लेकिन वास्तव में दूसरे उन्हें भांप लेते हैं। हमारी भावनाएं केवल दूसरों को ही नुकसान नहीं पहुंचातीं, हमारा नुकसान भी करती हैं। जब हम दूसरों का बुरा सोचते हैं, तो हम स्वयं को मिली बेशकीमती सांसें बर्बाद करते हैं। दूसरों की आलोचना में लगाया गया समय हमें प्रभु से मिलन के अपने लक्ष्य से दूर कर देता है।

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