ज्ञान गंगा : साधु ने बताया कि भोग के लिए नहीं जीवन

sadhu_30_09_2015निर्जन वन में रहने वाले एक त्यागी साधु के समक्ष एक दिन एक देवता प्रकट हुए और वर मांगने के लिए कहा। साधु समझ गया कि देवता अपना चमत्कार दिखाने और उसे उपकृत करने आए हैं। अस्तु साधु ने देवता से पूछा – ‘आप मुझे क्या दे सकते हैं?” देवता हंसते हुए बोले – ‘धन, रत्न, बल, यश, पद, प्रभुत्व, सब दे सकता हूं। बोलो तुम्हें क्या चाहिए?”

साधु हंसा और बोला – ‘अच्छा तो आप मुझे मूर्ख बनाने आए हैं! इन सबकी मुझे क्या जरूरत!” यह सुनकर देवता चौंके। उन्हें अब तक ऐसा कोई नहीं मिला था, जो ऐसी किसी भी चीज की चाह न रखता हो। उन्होंने कहा – ‘प्रतिभा, कला, विद्या का वरदान भी चाहो तो मांग सकते हो।” साधु ने पुन: निरपेक्ष भाव से कहा – ‘आप देख ही रहे हैं कि मेरे पास मेरी जरूरत के मुताबिक साधन, विद्या और बुद्धि है। मुझे इससे अधिक का लोभ नहीं।”

‘तो सिद्धियां…” देवता ने कहना चाहा। लेकिन साधु ने उन्हें बीच में ही टोकते हुए कहा – ‘आप व्यर्थ मुझे प्रलोभन दे रहे हैं! मैं एक मनुष्य हूं। पक्षी आकाश में उड़ते हैं और मछली जल में विचरती है। चींटी नन्ही है और हाथी भारी। ऐसी कौन-सी सिद्धि है जो किसी पशु-पक्षी या कृमि में सहज नहीं है!” देवता हैरान थे। उन्होंने फिर कहा – ‘आपके पास सीमित सामग्री है। आपका शरीर सदा स्वस्थ रहे, इसका आश्वासन नहीं है। आपको इस ओर से निश्चिंत कर सकता हूं।”

साधु हंसा और बोला – ‘मेरा शरीर, मेरी बुद्धि, मेरी सामर्थ्य कितनी सीमित है, यह आपसे छिपा नहीं। किंतु इस पर भी आप मेरी निश्चिंतता, मेरी सुव्यवस्था तो देख ही सकते हैं।” देवता को सूझ नहीं रहा था कि वे साधु को वर-प्राप्ति के लिए कैसे मनाएं! साधु ने उनसे कहा – ‘आप देवता सही, पर आपकी दिव्य-दृष्टि की भी सीमा है। आप उन आदिशक्ति जगन्माता को नहीं देख पा रहे हैं, जिनकी कृपा से सारी सृष्टि संचालित है। उनके आश्रित बालक को भला आप क्या दे सकते हैं!” यह सुन देवता वहां से अदृश्य हो गए।

साधु मुस्करा उठा। उसकी मुस्कान मानो कह रही थी कि हमारा जीवन या देह भोग के लिए नहीं है। मनुष्य जब इस सत्य को छोड़कर इंद्रियों को व्यक्त करने के लोभ में पड़ता है तो उसे मूर्ख ही नहीं, रोगी भी बनना पड़ता है और वह कष्टों में जकड़ जाता है। बेहतर है, इससे बचा जाए।

 
 
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