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जानिए अग्नि साधना कैसे तय करता है आध्यात्म के रास्ते को

 

कहते  हैं कि हनुमान, भीम आदि अनेक पौराणिक पात्र अग्नि की साधना के जरिए सशरीर अमर हो गए। शरीर पंच तत्वों से बना है। अब विज्ञान भी यह संभव मानने लगा है कि शरीर की कोशिकाओं पर नियंत्रण कर लिया जाए, तो उसकी मरण-धर्मा की प्रकृति बदल सकती है। प्राचीन काल में अग्नि साधना के जरिए यह संभव कर लिया गया था। महाबलि हनुमान, भीम, अश्वत्थामा आदि सात चिंरजीवियों का उल्लेख इसी संदर्भ में अर्थात अग्नि विज्ञान की संभावनाओं के मद्देनजर किया जाता है। जानिए अग्नि साधना कैसे तय करता है आध्यात्म के रास्ते को

 

अग्नि साधना को अध्यात्म मार्ग में सबसे असरदायक समझा जाता है। वैज्ञानिक अब भी खोजने में लगे हैं कि कोशिका को ढलने से कैसे रोका जाए और मौत पर विजय हासिल किया जाए। मौत को इच्छा-मृत्यु में बदलने की संभावना के उल्लेख वेद, उपनिषद् और महाभारत आदि शास्त्रों में मिलते हैं।  

 वेद में अग्नि को धरती, आकाश, अंतरिक्ष, पाताल, वनस्पतियों, औषधियों, अन्न, फल और हर जीव में मौजूद होने की बात कही गई है। यही अग्नि कर्मकांडों, यज्ञों, हवनों, उत्सवों और संस्कारों में मौजूद है। यही अग्नि साधक और तपी की वाणी में मौजूद है। स्वर, भाषा, भाव और अक्षर की उत्पत्ति का कारण भी अग्नि ही है। उपनिषद् के मुताबिक, अग्नि शब्द का ‘अ’ अक्षर देवनागरी वर्णमाला का पहला अक्षर है। ‘अ‘ अक्षर भाषा का मूल है, ध्वनि का मूल है। वेद में सूर्य रूपी अग्नि को सारे जगत का आत्मा बताया गया है। शरीर के जीवित रहने का कारण अग्नि है। यह अग्नि आत्मा है। 

अग्नि के अलग-अलग कार्य हैं। जिस तरह यज्ञशाला में अग्नि के जरिए ही कर्म आगे बढ़ता और संस्कार पूरे होते हैं, उसी तरह शरीर रूपी यज्ञशाला में भी आत्मा रूपी अग्नि के जरिए तमाम काम पूरे होते हैं। वेद विज्ञान के मुताबिक अग्नि में तरंगें होती हैं, इसलिए अग्नि दूत, अग्नि अश्व, अग्नि आत्मा, अग्नि प्राण, अग्नि सुकर्म, अग्नि ज्ञान, अग्नि विज्ञान और अग्नि दर्शन है। वेद में इंसान को अग्निमय जिंदगी बसर करने की सलाह दी गई है। 

 
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