भीषण गर्मी के इस मौसम में दिल्ली में जल संकट गहराता जा रहा है। कुछ इलाकों में तो लोग बूंद- बूंद पानी को तरस रहे हैं। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि देश की राजधानी में पानी के लिए सिर फुटौव्वल की नौबत आ रही है। यह स्थिति भी तब है जब जल बोर्ड की कमान स्वयं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल संभाल रहे हैं। क्यों बना हुआ है यह संकट, क्या हैं कारण और समाधान। इन्हीं मसलों पर के मुख्य संवाददाता संजीव गुप्ता ने पूर्व जल मंत्रीकपिल मिश्रा से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश :-जल संकट के लिए आप सरकार की टकराव की राजनीति जिम्मेदार

क्या वजह है कि दिल्ली में जल संकट गहरा रहा है?
-जितना जल संकट इस साल देखने को मिल रहा है, पहले नहीं था। जनवरी माह में हर साल अमोनिया की मात्रा बढ़ने से कुछ दिन परेशानी रहती है और वजीराबाद जल संयंत्र भी ठप रहता है। लेकिन, इस बार यह संयंत्र मार्च के आखिर तक लगभग ठप ही रहा। वजह, संयंत्र का रखरखाव समय पर नहीं किया गया। मैंने अपने कार्यकाल में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर वजीराबाद जल संयंत्र में ही ऐसी व्यवस्था शुरू की थी कि अमोनिया आने पर भी बहुत ज्यादा परेशानी न आए। मेरे हटने के बाद कोई ध्यान नहीं दिया गया। गर्मियों में जल संकट नियंत्रण में रहे, इसके लिए समर एक्शन प्लान तैयार किया जाता है, लेकिन इस साल वह भी आधा-अधूरा और कमोबेश पुराना ही जल बोर्ड की वेबसाइट पर डाल दिया गया। जल मंत्री खुद मुख्यमंत्री हैं, उनकी उपलब्धता भी किसी के लिए नहीं है। न वह जनता के लिए, न अधिकारियों के लिए ही उपलब्ध हैं। वह तो बस कभी जल संकट के लिए हरियाणा सरकार को दोषी ठहरा देते हैं तो कभी प्रधानमंत्री को पत्र लिख देते हैं।

जल संकट की सच्चाई आखिर है क्या?
-हर साल दिल्ली में 900 से 920 एमजीडी तक ही पानी की आपूर्ति होती है। इस समय भी उतनी ही चल रही है। इसलिए यह कहना कि हरियाणा सरकार दिल्ली को कम पानी दे रही है, सफेद झूठ है। सारी खामियां वितरण व्यवस्था की है। पिछले छह माह में एक भी पंप की मरम्मत नहीं हुई है। प्रीत विहार, मॉडल टाउन, वसंत कुंज और ग्रेटर कैलाश जैसे पॉश इलाकों में भी गंदे पानी की आपूर्ति हो रही है। निजी टैंकर माफिया फल फूल रहा है। जल बोर्ड भी टैंकर माफिया पर ही निर्भरता बढ़ा रहा है। जबकि उनकी जवाबदेही खत्म कर दी गई है, उन पर निगरानी के लिए लगाया गया जीपीएस सिस्टम तक खत्म कर दिया गया है।

बेहतर जल आपूर्ति के लिए आप ने चुनावी घोषणा पत्र में क्या कुछ वादे किए थे, जो पूरे नहीं किए गए?
पहला वादा तो यही था कि 20 हजार लीटर पानी मुफ्त दिया जाएगा, लेकिन यह भी कहीं मिल रहा है और कहीं नहीं। दूसरा वादा था कि हर कॉलोनी में जल बोर्ड की पाइपलाइन से पानी पहुंचाया जाएगा। जब तक मैं जल मंत्री था तो 14 फरवरी 2017 तक 309 कॉलोनियों में पाइपलाइन नेटवर्क बिछाया जा चुका था। जबकि उसके बाद करीब सवा साल में महज 10 कॉलोनियों में ही यह नेटवर्क बिछाया जा सका है। एक वादा था कि हर झुग्गी बस्ती में जल बोर्ड का पानी पहुंचाया जाएगा, इसके लिए 500 करोड़ का बजट भी रखा गया था, लेकिन आज तक एक भी झुग्गी बस्ती में पानी नहीं पहुंचा। सातों दिन 24 घंटे पानी देने का वादा भी पूरा नहीं किया गया। नए भूमिगत जलाशय बनाने की योजना भी कछुआ गति से चल रही है। टैंकर माफिया को खत्म करना था, लेकिन इस साल 56 टैंकर और बढ़ा दिए गए हैं।

मतलब, सुधार के नाम पर स्थिति और बदतर ही हुई है?
-बिल्कुल, जबकि अब तो उत्तर प्रदेश सरकार ने भी गंगा से 15 एमजीडी पानी दिल्ली को देना शुरू कर दिया है। आलम यह है कि जल संयंत्र कहीं खराब तो कहीं ठप हैं। नए भूमिगत जलाशय शुरू नहीं हो पाए हैं। टैंकर माफिया पर पारदर्शिता नहीं है। सबसे बड़ी विडंबना यह कि 8 मार्च 2017 को जो जल बोर्ड 178 करोड़ रुपये के फायदे में था, इस साल आरटीआइ के जवाब में सामने आया है कि जल बोर्ड 800 करोड़ रुपये के घाटे में चल रहा है। हैरत की ही बात है कि जिस जल बोर्ड का सालाना बजट दो हजार करोड़ का है, वह करीब एक हजार करोड़ के घाटे में आ गया है।स्टाफ की तनख्वाह देने के लिए भी जल बोर्ड को अपनी पुरानी एफडी तुड़वानी पड़ रही है।

जल संकट पर काबू कैसे पाया जा सकता है?
-सबसे पहले तो आप सरकार आरोप -प्रत्यारोप की राजनीति बंद करे। पड़ोसी राज्यों से संबंध बेहतर रखकर ही स्थिति में सुधार संभव है, लड़कर नहीं। टैंकर माफिया से मुक्ति पाएं और जलबोर्ड की वितरण व्यवस्था दुरुस्त करे। लीकेज पर काबू पाया जाए। समय-समय पर जल बोर्ड के स्टाफ और जनता से मुखातिब हुआ जाए। जरूरत के मुताबिक सख्ती बरती जाए। जल बोर्ड को बोर्ड का दर्जा प्राप्त है, वहां कोई भी एक्शन लेने के लिए न तो पूर्ण राज्य का दर्जा चाहिए और न ही उपराज्यपाल की मंजूरी। चाहिए तो बस साफ नीयत।