गुरदासपुर जीत की गूंज, पंजाब की पॉलिटिक्स पर डालेगी भरी असर

क्या गुरदासपुर उपचुनाव के नतीजे चौंकाते हैं? क्या ये पंजाब सूबे में कांग्रेस के पंजे के पूरी तरह छा जाने पर आखिरी मुहर है? क्या पंजाब में आम आदमी पार्टी को अपना शटर डाउन करने का ऐलान कर देना चाहिए? गुरदासपुर के नतीजों में बीजेपी-अकाली गठबंधन के लिए क्या सबक छिपे हैं?गुरदासपुर जीत की गूंज, पंजाब की पॉलिटिक्स पर डालेगी भरी असर

इन सारे सवालों का उठना आज लाजिमी है. कांग्रेस ने विनोद खन्ना की मौत के बाद खाली हुई गुरदासपुर सीट पर जिस तरह की धमाकेदार जीत हासिल की है, वो सूबे में कई समीकरणों के साबित होने का इशारा है तो कई के आने वाले दिनों में बिगड़ने की शुरूआत है. सुनील जाखड़ ने करीब 2 लाख वोट के अंतर से बीजेपी के स्वर्ण सलारिया को मात दी है. कांग्रेस को 58.2 फीसदी वोट हासिल हुए हैं. वहीं बीजेपी को मिले हैं 35.7 फीसदी. आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार खजूरिया की जमानत जब्त हो गई. उन्हें सिर्फ 2.74 फीसदी मत मिल पाए.

पंजाब में छा गया ‘पंजा’

अमूमन, ट्विटर पर शांत से रहने वाले पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह यूं ही नहीं इतरा रहे. एक के बाद एक ट्वीट बता रहे हैं कि पार्टी इस जीत से किस कदर खुश है. अमरिंदर सिंह तो इसे 2019 से पहले कांग्रेस में नई जान फूंकने के तौर पर भी देख रहे हैं.

अमरिंदर इसी साल हुए विधानसभा चुनाव के हीरो हैं. कैप्टन वो नेता हैं जो 2014 में बीजेपी की लहर के वक्त भी अमृतसर सीट बचा लेते हैं. फिर अपने नेतृत्व में सूबे में सरकार बनवा देते हैं. विधानसभा चुनाव के दौरान गुरदासपुर की 9 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने 7 पर कब्जा जमाया था. कांग्रेस के सुनील जाखड़ ने इस प्रदर्शन को जाया नहीं जाने दिया. सियासत का ये पहलू भी खासा दिलचस्प है. दिग्गज कांग्रेसी बलराम जाखड़ के बेटे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़, विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ‘लहर’ में अपनी अबोहर सीट नहीं बचा पाए. लेकिन वही जाखड़, लोकसभा उपचुनाव में धाकड़ बनकर उभरते हैं, अपने गढ़ से 300 किलोमीटर दूर गुरदासपुर आते हैं और विरोधी को शिकस्त दे देते हैं. वो भी धमाके के साथ.

ये बिना शक कांग्रेस के बढ़ते कद की ओर इशारा करता है. पंजाब के माझा में कांग्रेस का दबदबा हमेशा से रहा है. ये अलग बात है कि बीते कुछ सालों में सिद्धू की शख्सियत ने इस इलाके में कांग्रेस की चमक कुछ फीकी की थी. लेकिन अब सिद्धू ने कमल से उछलकर कांग्रेस से हाथ मिला लिया है. गुरदासपुर में इम्तेहान सिद्धू का भी था. उनके तीखे अटैक स्टायल का भी था. और उन्होंने कसर नहीं छोड़ी.

बीजेपी उम्मीदवार स्वर्ण सलारिया और पंजाब सरकार में मंत्री रह चुके सुच्चा सिंह के वायरल हो चुके अंतरंग वीडियो पर सिद्धू ने जबर्दस्त तरीके से हमला बोला. इसका फायदा जीत के अंतर में साफ दिखाई देता है. और ये भी कि सिद्धू को खोना बीजेपी को आगे जाकर पंजाब की सियासत में बहुत भारी पड़ने वाला है.

आम आदमी पार्टी की झाड़ू खुद ‘साफ’ हो गई

एक दौर था, जब दिल्ली के बाहर किसी सूबे पर अरविंद केजरीवाल की नजर थी तो वो पंजाब था. दौर ज्यादा पुराना नहीं हुआ. सिर्फ 3 साल. लेकिन, इन 3 सालों में जैसे आम आदमी पार्टी की किस्मत चक्करघिन्नी की तरह घूम-घूमकर अब ऐसी जगह ठहरी है जहां से पंजाब में उसका सिर उठाना चमत्कार से कम नहीं होगा. कमर बुरी तरह टूटी है. ये AAP को दिखाई भी दे रहा होगा. गुरदासपुर में आप उम्मीदवार सुरेश खजूरिया को मिलते हैं महज 23 हजार वोट.

पार्टी पुराने रंग तो ला नहीं सकती, पुराने आरोपों पर लौट आई है–मतदान के दौरान भ्रष्टाचार का. पार्टी ने बौखला कर गुरदासपुर और पठानकोट यूनिट भंग कर दी है. 2014 के आम चुनाव में आप ने 13 में से 4 लोकसभा सीटें जीत कर तहलका मचा दिया था. विधानसभा चुनाव में जीत के बड़े दावे किए गए. मालवा क्षेत्र में दुंदुभी बजाने के भी लेकिन सब फेल हो गया और 117 में सीटें मिलीं सिर्फ 20.

अब गुरदासपुर में हार के बाद पार्टी के पास सिवाय ये सोचने के कुछ नहीं बचा कि आखिर इन 3 सालों में गलती हुई कहां? ईमानदारी से सोचेंगे तो जवाब सामने से झांकता मिल जाएगा.

अकाली-बीजेपी गठबंधन के लिए क्या हैं सबक?

गुरदासपुर 20 साल पहले किसके पास था ये बात बहुत मायने नहीं रखती. ठीक वैसे ही जैसे 20 साल पहले बीजेपी किस हालत में थी, ये बात. साल 1998 में बीजेपी-अकाली गठबंधन ने मिलकर चुनाव लड़ा और गुरदासपुर सीट बीजेपी की झोली में आ गिरी. विजयी उम्मीदवार थे, अभिनेता विनोद खन्ना. उन्होंने पहली ही बार में जोरदार जीत दर्ज की. खन्ना ने 5 बार जीत चुकी सुखबंस कौर को 1 लाख से ज्यादा वोटों से मात दी. हालांकि, 2009 में वो हारे पर 2014 में वापसी कर ली. इस लिहाज से बीते दो दशक में हालात चाहे जो रहे हों, गुरदासपुर के लोगों ने बीजेपी पर भरोसा जताया. लेकिन, इस बार सुनील जाखड़ की जीत बताने के लिए काफी है कि बीजेपी-अकाली गठबंधन को आत्ममंथन के दौर मे चले जाना चाहिए. सुनील जाखड़ हिंदू उम्मीदवार हैं. करीब 30 साल बाद कांग्रेस ने जाट सिख के बजाय किसी हिंदू उम्मीदवार को यहां उतारा और पासा पलटने में पूरी तरह कामयाब रही.

इस गठबंधन को समझना होगा कि सिर्फ अमीर उम्मीदवार खड़ा करना कई बार काफी नहीं होता. स्वर्ण सलारिया ने 700 करोड़ की संपत्ति घोषित की. लेकिन, कुछ अश्लील वीडियो के जाल में वो इस कदर फंसे कि कुछ काम नहीं आया. सलारिया की खुद की ब्रांड वैल्यू भी असरदार नहीं मानी जाती. जब तक बीजेपी, ‘रंगीन’ शख्सियत के मालिक सलारिया से पल्ला झाड़ती, काफी देर हो चुकी थी.

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पंजाब में अकाली सरकार के कामकाज को लेकर गुस्सा गहरे तक समा चुका है. जब कभी दोस्ती पर सवाल उठे, सुखबीर बादल बचाव में आए और कहा कि गठबंधन पर कोई खतरा नहीं. लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी देश भर में बीजेपी की जो छवि देखना चाहते हैं, मुमकिन है उस फ्रेम में अकाली की मौजूदगी तस्वीर को थोड़ा बिगाड़े. ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों अलग रास्तों पर चलना पसंद कर सकते हैं.

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