खेल दिवस पर विशेष : हॉकी के जादूगर ने दिलाया खेल और खिलाड़ियों को सम्‍मान

लखनऊ। मेजर ध्यानचंद भले ही हॉकी के जादूगर रहे हों लेकिन आज वह खेल जगत में सभी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। स्टेडियम पर प्रैक्टिस करने वाले खिलाड़ियों को संघर्ष का जज्बा दद्दा से मिलता है। ध्यानचंद ने भले ही नवाबों की नगरी में कम समय गुजारा हो लेकिन यहां के खिलाड़ियों के दिलों में वह राज करते हैं। लखनऊ के कई खिलाड़ियों ने उनके साथ बिताए गए उन लम्हों के बारे में बताया जो आज भी उनके मानस पटल पर अंकित हैं। इतने दिग्गज खिलाड़ी होने के बाद भी वह बेहद सरल स्वभाव के थे।

समय का पता ही नहीं लगता था
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद केडी सिंह बाबू स्टेडियम के साथ ही स्पोर्ट्स कॉलेज भी आते जाते रहे। यहां पर ट्रेनिंग के लिए आने वाले खिलाड़ियों को वह प्रशिक्षण भी देने पहुंच जाते। फील्ड पर पहुंचने के बाद आलम यह होता था कि ना तो खिलाड़ियों को पता लगता था कि वह कितनी देर से प्रैक्टिस कर रहे हैं और ना ही खुद मेजर ध्यानचंद को टाइम का पता लगता। यहां के पूर्व खिलाड़ी बताते हैं कि कई बार हम लोगों उनकी स्टाइल नकल करने की काशिश की लेकिन सफल नहीं हो सके। पूर्व ओलम्पियन सैयद अली बताते हैं कि वह हम सभी के लिए प्रेरणा स्रोत रहे।
पूर्व खिलाड़ियों से बातचीत
आज भी मेरे जेहन में वह यादें ताजा हैं जब राजधानी में हॉकी हॉस्टल की शुरुआत हुई। केडी सिंह बाबू हॉकी स्टेडियम में यह हॉस्टल खोला गया। हमारे साथ कई खिलाड़ी वहां पर प्रैक्टिस करते थे। एक दिन केडी सिंह बाबू साहब ने शाम को हम लोगों को एक दिग्गज खिलाड़ी से मिलाने का वादा किया। अगले दिन हम लोग ग्राउंड पहुंच गए और लाइन अप होकर बाबू साहब का इंतजार कर रहे थे। थोड़ी देर बाद बाबू साहब और ध्यानचंद जी हम लोगों के सामने आए। वह हम सभी खिलाड़ियों के लिए आदर्श थे। उन्हें सामने देखकर हमें यकीन ही नहीं हो रहा था। भूरे रंग का सूट, लाल टाई और चश्मा पहने ध्यान चंद से बाबू साहब ने हम लोगों को कुछ सिखाने को कहा। इसके बाद वह ग्राउंड में दाखिल हुए और एक शानदार स्टाइल से बॉल को गोल पोस्ट में पहुंचाया। हम सभी ने उस स्टाइल को नकल करने की बहुत कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो सके। इसके बाद यहां पर आयोजित हुए एक इन्वीटेशनल हॉकी टूर्नामेंट में वह चीफ गेस्ट बन कर भी आए. उस दौरान भी उनसे मुलाकात करने का मौका मिला।
सैयद अली, पूर्व ओलम्पियन, हॉकी
हमें आज भी याद है जब वह यहां पर एक टूर्नामेंट में चीफ गेस्ट बन कर आए थे। बीएसएफ और पंजाब के बीच फाइनल मैच खेला जा रहा था। इसी दौरान किसी बात पर दोनों टीमों में झगड़ा हो गया। ऐसे में दद्दा ने सभी को फटकार लगाई और दोबारा ऐसा ना करने के लिए कहा। इसके बाद दोनों टीमों ने उनसे माफी मांगी और खेल शुरू किया। उनके हर आदेश को लोग दिल से मानते थे। आयोजकों ने भी उन्हें यकीन दिलाया कि अब दोबारा इस तरह के विवाद नहीं होंगे। प्राइज बांटते समय वह सभी बातों को भूल चुके थे और दोनों टीमों के खेल को शानदार बताकर उनका मनोबल बढ़ाया।
सुजीत कुमार, पूर्व ओलम्पियन, हॉकी
हॉकी के साथ ही उन्हें अन्य खेलों का भी शौक था। फुटबाल और एथलेटिक्स के खिलाड़ियों को भी वह खूब बढ़ावा देते। उनका बस यही कहना था खेल कोई भी उसे ईमानदारी से खेलो। खेलने पर हार जाओ तो परेशान मत और अधिक मेहनत कर आगे बढ़ने की कोशिश करो। लखनऊ में वह कई बार आए तो उनसे मिलने का मौका मिला। कई बार वह यहां पर खिलाड़ियों से बातचीत करने खुद ही ग्राउंड पर पहुंच जाते। वहां पर यदि कोई हॉकी गलती कर रहा होता तो उसे खुद ही बुलाकर समझाने लगते और उसका खेल सही कराते।
डॉ.आर पी सिंह, पूर्व इंटरनेशनल, हॉकी खिलाड़ी निदेशक, उत्तर प्रदेश खेल निदेशालय
हम लोगों ने जब हॉकी का ककहरा पढ़ना शुरू किया तब से उनके बारे में सुनते नजर आ रहे हैं। हमारी सीनियर खिलाड़ियों को कहना है कि खेल के प्रति जब उनके जैसा समर्पण होगा तभी तुम भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा बनोगे। आज भी खिलाड़ी किसी खेल के हो, उन सभी के आदर्श ध्यान चंद हैं। उत्तर प्रदेश के इस खिलाड़ी ने उस समय विश्व में भारतीय खेलों का लोहा मनवाया जब हमारे यहां इतनी सुविधाएं नहीं हुआ करती थी।
रजनीश मिश्रा, भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान
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