कमलनाथ-सिंधिया ‘सुनिश्चित’ जीत और ‘संदिग्ध’ जीत में फर्क समझेंगे? – उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी
रविवार को भोपाल में मीडिया से मुखातिब कांग्रेस के महामंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सियासत के तारों को छेड़ते हुए गहरा सैध्दांतिक सुर साधा है कि संसदीय चुनाव में कांग्रेस के लिए कठिन सीटों पर बड़े और मजबूत नेताओं को लड़ना चाहिए। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी ऊंचा राजनीतिक आलाप लेते हुए रणनीतिक-पेशकश की थी कि इंदौर, भोपाल, ग्वालियर या जबलपुर जैसी कठिन सीटो पर मजबूत नेताओं को चुनाव लड़ना चाहिए। कमलनाथ और सिंधिया की जुगलबंदी का यह प्रसंग वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह से जुड़ा है कि उन्हें राजगढ़ की संसदीय सीट से चुनाव लड़ना चाहिए अथवा इंदौर-भोपाल जैसी उन सीटों पर दांव आजमाना चाहिए, जो दो-ढाई दशकों से भाजपा के कब्जे में हैं। राजनीतिक हलकों में यह विश्‍वास है कि दिग्विजय सिंह राजगढ़ में सहजता से चुनाव जीत सकते हैं, जबकि इंदौर और भोपाल संसदीय क्षेत्र भाजपा के अभेद किले माने जाते हैं। पिछले तीस सालों से इंदौर और भोपाल सीट पर भाजपा का कब्जा है। कमलनाथ-सिंधिया की जुगलबंदी में सुर फूट रहे हैं कि इन सीटों पर भाजपा के वर्चस्व को खत्म करने के लिए किसी एक सीट से दिग्विजय सिंह को मैदान में उतारा जाना चाहिए।
शेरो-शायरी और आशिकी के आलम में सादगी पर मर-मिटने के किस्से भले ही आम हों, लेकिन आशिकों की मानिन्द सियासत के पन्नों में ’सादगी’ पर मर-मिटने जैसे किस्से और तकरीरें देखने-सुनने में नहीं आते हैं, लेकिन  प्रदेश कांग्रेस के इन शीर्ष नेताओं के बयानों में तथाकथित ’सियासी-सादगी’  का जो नूर टपक रहा है, उसे देखते हुए आम कांग्रेस-जनों के मन में चाहे जो प्रतिक्रिया हो, लेकिन कांग्रेसजन से इतर भाजपा के समर्थक जरूर मर मिटने पर आमादा हो जाएगें। राजनीतिक रणनीति में सुनिश्‍चित विजय और संदिग्ध जीत के हालात में फर्क समझना मुश्किल काम नहीं हैं।  राजनीतिक दल सुनिश्‍चित जीत को हाशिए पर रख कर संदिग्ध जीत का वरण करने की रणनीति को प्राथमिकता नहीं देते हैं। कमलनाथ-सिंधिया की इस थ्यौरी का विस्तार कांग्रेस को शीर्ष नेतृत्व को भी दायरे में समेटता है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में  प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने के लिए कौन तत्पर है?  सिंधिया-कमलनाथ की यह जुगलबंदी देश और प्रदेश के राजनीतिक चुनौतियों की कसौटियों पर सटीक महसूस नहीं हो रही है। यदि दिग्विजय सिंह भोपाल की सीट जीतने के लिए मैदान में उतरेंगे तो क्या सिंधिया गुना की सुरक्षित सीट छोड़ कर इंदौर में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को चुनौती देने को तत्पर हैं?
माहिर रणनीतिकार अपने मजबूत किलों को लावारिस छोड़ कर अपने मजबूत सिपहसालारों और उपलब्ध अवसरों को जोखिम के जंगलो में नहीं छोड़ते हैं।  उदार आंकलन के मुताबिक मप्र की 29 लोकसभा सीटों में कांग्रेस की जीत का अनुमानित आंकड़ा 12 सीटों के आसपास घूम रहा है। कांग्रेस के सामने नरेन्द्र मोदी की चुनौतियां हैं।इंदौर-भोपाल की सीट की कहानी जगजाहिर है, लेकिन राजगढ़ सीट का सफर भी कांग्रेस के लिए आसान नहीं रहा है। 1962 के बाद सोलह लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 9 बार जीती है। याने राजगढ़ में भी कांग्रेस का स्ट्राइक रेट 56 प्रतिशत ही है। यहां चार बार भाजपा और तीन मर्तबा निर्दलीय, जनता पार्टी और भारतीय लोकदल के प्रत्याशी जीते हैं। गौरतलब है कि कांग्रेस की 9 जीतों में भी 6 जीतों की राजनीतिक पृष्ठभूमि में दिग्विजय-फेक्टर हावी है। राजगढ़ से दो मर्तबा खुद दिग्विजय सिंह और पांच मर्तबा उनके छोटे भाई लक्ष्मण सिंह विजयी रहे हैं।
राजनीति में चुनौती देने वाले अपने समकक्षों को राजनीतिक बियाबान में ढकेलने के लिए कमोबेश सभी राजनीतिक दलो में ऐसे हथकंड़े अपनाए जाते रहे हैं। भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही है। 2003 के विधानसभा चुनाव के दरम्यान जब उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं थीं, तो उनके समर्थको ने शिवराजसिंह चौहान को वनवास देने की गरज से दिग्विजयसिंह के मुकाबले राघौगढ़ विधानसभा चुनाव में उतार दिया था। शिवराज चुनाव में हार गए थे। खुद शिवराज सिंह ने 2013 में कैलाश विजयवर्गीय की राहों को पथरीली बनाने के लिए उनके सुनिश्‍चित विधानसभा क्षेत्र इंदौर-1 से निकाल कर महू से चुनाव लड़ने के लिए भेज दिया था। कांग्रेस में भी मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के विरोधी नेताओं ने 1986 में दिल्ली से लोकसभा चुनाव के मैदान में उतार दिया था। हालांकि वो जीते थे और देश के संचार मंत्री बने थे। वैसे भी कांग्रेस समर्थन की कमजोर लहरों पर सवार है। उसे अपना घट भरने के लिए बूंद-बूंद समर्थन जुटाना है। राजनीतिक-घट की छीना-झपटी में बूंदे जाया नहीं हों…।
 
सम्प्रति- लेखक श्री उमेश त्रिवेदी भोपाल एनं इन्दौर से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। यह आलेख सुबह सवेरे के 19 मार्च के अंक में प्रकाशित हुआ है।वरिष्ठ पत्रकार श्री त्रिवेदी दैनिक नई दुनिया के समूह सम्पादक भी रह चुके है।

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