कबीर दास : बुरा जो देखन मई चला, बुरा न मिलया कोई….

आप सभी को बता दें कि भारत की भूमि पर जन्म लेने वाले महापुरुषों में संत कबीर का नाम बड़े आदर से लिया जाता है और आप जानते ही होंगे कि उन्होंने समाज में व्याप्त तमाम तरह के पाखंड का विरोध करते हुए लोगों को सही दिशा दिखाने का काम किया।.

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ऐसे में संत कबीर ने अपने पूरे जीवन काल में पाखंड, अंधविश्वास और व्यक्ति पूजा का विरोध करते हुए अपनी अमृतवााणी से लोगों को एकता का पाठ पढ़ाया और आज भी कबीर की वाणी अमृत के समान है, जो व्यक्ति को नया जीवन देने का काम कर रही है.

ऐसे में संत कबीर के लोकप्रिय दोहे हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में ले जाने का काम करते हैं. आप सभी को बता दें कि कबीरदास जी ने अपने पूरे जीवनकाल में लोगों के बीच प्रेम, सद्भाव और एकता कायम करने का प्रयास किया और उन्होंने अपनी अमृत वाणी से ही नहीं बल्कि स्वयं का उदाहरण पेश करते हुए लोगों के भ्रम को तोड़ने की कोशिश की थी.

इसी के साथ कबीरदास जी ने स्वर्ग और नर्क को लेकर समाज में व्याप्त भ्रांतियों को तोड़ने के लिए एक बड़ी मिसाल पेश की और उन्होंने अपना पूरा जीवन काशी में बिताने के बाद अपने अंतिम समय के लिए एक ऐसे स्थान को चुना, जिसे उन दिनों अंधविश्वास कायम था कि वहां पर मरने से व्यक्ति नरक में जाता है.

कहा जाता है कबीर दास जी ने लोगों को इस भ्रम को तोड़ने के लिए अपने अंतिम समय में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के पास मगहर चले गए और उन्होंने वहीं पर अपनी देह त्यागी और कबीरदास जी का जब मगहर में देहावसान हो गया तो उनके हिंदू और मुस्लिम भक्तों में उनके शव के अंतिम संस्कार को लेकर विवाद हो गया.

कहा जाता है कि उस समय जब उनके मृत शरीर से चादर हटाई गई तो वहां पर लोगों को सिर्फ फूलों का ढेर पड़ा मिला और उसके बाद आधे फूल से हिंदुओं ने अपनी रीति-रिवाज के मुताबिक और मुस्लिम ने अपनी परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार किया.

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