उत्तर कोरोना काल मे बहुत कुछ बदलेगा

दिनेश दत्त शुक्ल
हमने अपनी जिजीविषा से बीते कालखंड में बहुत कुछ झेला है, गिरे हैं, फिर उठ खड़े हुए हैं किन्तु मानव इतिहास के इस सबसे लम्बे और व्यापक विषाणु काल से उपजे लॉक डाउन के बाद उत्तर कोरोना वाली दुनिया की स्थिति निश्चित रूप से अपने वर्तमान से कुछ भिन्न होगी।
हम एक दूसरे से हाथ मिलाने की तहजीब को भूलने का प्रयास करेंगे, आजादी के बाद हुये सबसे बड़े पलायन और विस्थापन के दर्द को झेलने वाले, क्या अपने उसी रूप में फिर से महानगरों की ओर मुखातिब होंगे।

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यह एक विचारणीय विषय होगा कि आधुनिक राष्ट्र राज्य की अवधारणा और ग्राम स्वराज की अवधारणा में कैसे सामंजस्य बैठाया जाये कि आवश्यकता पड़ने पर ग्राम स्तर पर निवास कर रहे लोगों को /जन को, राष्ट्रीय तंत्र के भरोसे का मोहताज न होना पड़े। वैश्वीकरण, निजीकरण, विकास की अ-सीमा(दो लेन चार लेन अब सोलह लेन), धन और लोभ का अधिकतम संग्रह, सत्ता का अहंकार, धर्म की निजता आदि जैसे इन सब तमाम संदर्भों पर नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता निश्चित रूप से पड़ेगी।
बीते कई दिनों से जब धर्म के सारे मठ/ केंद्र (मंदिर मस्जिद चर्च) बंद पड़े हैं तो क्या हम सबको ईश्वर के अनीश्वरता पर फिर से बहस करनी पड़ेगी।
ऐसे तमाम प्रश्न हम सबके सामने मुंह बाये खड़े होंगे और तब आगे इसके उत्तर भी आयेंगे जो निश्चित रूप से नयी अवधारणाओं को जन्म देंगे।

उत्तर कोरोना के बाद पूरे विश्व की आर्थिकी बदल जायेगी। धन का जो असीमित प्रवाह अबाध रूप से हवा में तैर रहा था उस पर विराम लगेगा। महानगरों से गाँव की ओर लौटी एक बड़ी आबादी राष्ट्र राज्य के भरोसे कब तक जीवित रहेगी? बड़ी बड़ी कम्पनियों के बंद होने से बेकार हो रहे मध्यम वर्ग के युवा क्या करेंगे?
धन के प्रवाहता की कमी हमारे बैंकिंग तंत्र पहले से झेल रहे हैं ऐसे में इस कोरोना संकट और इससे उपजे लॉक डाउन को क्या हम सिर्फ उनको बड़ा और बड़ा बनाते जाने भर से संभाल पाएंगे? यह एक यक्ष प्रश्न होगा।
उत्तर कोरोना के बाद हमारी सामाजिकी में बड़े बदलाव आयेंगे। मात्र दस दिनों की घर बैठकी के बाद कितने परिवारों के सदस्य अवसाद की स्थिति में चले गये हैं, पड़ोस के मकान की एक महिला अपने आस पास श्रव्य और दृश्य दोनों माध्यमों में मात्र कोरोना की चर्चा के चलते गत कई दिनों से कोरोना कोरोना चिल्ला रही है। ऐसे में मनोविज्ञानियों और समाजशास्त्रियों का काम समाज के नये ढांचे को जांचने परखने में बढ़ जायेगा।
वर्तमान के हिसाब से हम एक ऐसे समाज में बदल रहे हैं जहाँ स्वयं को जीवित रखने के सिवा अन्य कोई मूल्य शेष नहीं रह गया है। आत्म और आत्मा से दूर बस एक देह का सवाल उपभोक्ता बनते जाने वाले लालच के परिणाम में दिखाई दे रहा है। इस एकांतवास के बाद सामाजिक संरचना का जो खुरदुरापन सतह पर फ़ैल रहा है उसकी भरपाई होने में वर्षों लग जायेंगे।
उत्तर कोरोना काल के बाद जो वैश्विक पुनर्जागरण हो रहा है उसमें निश्चित रूप से पूर्व की तथाकथित महा शक्तियां कहाँ खड़ी होंगी और वैश्विक नेतृत्व कहाँ केन्द्रित होगा इसको लेकर राजनीति विज्ञानियों को शोध का एक नया अवसर मिलेगा।
उत्तर कोरोना और वैश्विक पुनर्जागरण के बाद इतिहास का कालखण्ड कोरोना पूर्व और उत्तर कोरोना के रूप में लिखा जायेगा। एक नये जैविक हथियार की उपज के चलते युद्ध के तरीकों में बदलाव निश्चित है। ऐसे में साहित्य की भूमिका और बड़ी हो जायेगी।
एक तरफ़ मानवता को बचाने के लिये इस जैविक युद्ध से लड़ रही सत्ता और दूसरी ओर इस लड़ाई में पीड़ित तमाम लोगों की स्थिति जीवन मरण के रूप में उपस्थित हो गयी है। सत्ता के लिए यह स्थिति तो – भइ गति सांप छंछूदर केरी, की हो गयी है। “शुद्ध स्फुरण रूपस्य दृश्य भावं पश्यत:, क्व विधिः क्व च वैराग्यम् क्व त्याग: क्व शमोअपि वा”।

उत्तर कोरोना काल में चाँद और मंगल को छूने वाले हाथों के लिए प्रेम की नई परिभाषा गढ़नी पड़ेगी क्योंकि किसी का हाथ पकड़ने से पहले (माँ का वात्सल्य हो या भाई बहन का प्रेम या पति पत्नी का रिश्ता) उसके धुले होने की शर्त की प्राथमिकता आने से मन का उछाह तो गायब ही हो जायेगा।
देह धरे का गुन यही देह देह कछु देह बहुरि न देही पाइये अबकी देह सो देह।
कबीर तो देह छोड़ने की बात करते हैं पर क्या वह हम सबके लिये इतना आसान है। “कबीर सो धन संचिये जो आगे का होय, सीस चढ़ाये गाठड़ी जात न देखा कोय”। जीवन की इसी मुक्ति से बचने के लिये हम सब कैद हैं घरों में।
“न में जीव इति ज्ञात्वा, स जीवन्मुक्त उच्यते”।
उलझनों से मुक्त होना ही जीवन का परम उद्देश्य है।
गुरु गोविन्द सिंह ने लिखा –
देह सिवा बरु मोहि इहै सुभ करमन से कबहूँ न टरों ।।।
जब आव की अउध निदान बने अति ही रन में तब जूझ मरों।
उत्तर: कोरोना और वैश्विक पुनर्जागरण के इस नवयुग में अपने संचेतना, संवेदना और मानवीय मूल्यों का संरक्षण और परिवर्धन ही हम सबके अभ्युदय का कारक बने।
(लेखक दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं )
(डिस्क्लेमर : लेखक  वरिष्ठ पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Jubilee Post उत्तरदायी नहीं है।)

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