इल्म का समंदर कहे जाते थे अल्लामा ज़मीर अख्तर

प्रमुख संवाददाता
लखनऊ. विश्वविख्यात शिया धर्मगुरू अल्लामा ज़मीर अख्तर नकवी का आज पाकिस्तान के कराची शहर में निधन हो गया. उन्हें शनिवार की रात को आगा खान यूनीवर्सिटी हॉस्पिटल में दिल का दौरा पड़ने के बाद भर्ती कराया गया था. उन्हें कराची के अन्कोली इमामबाड़े में सुपुर्दे ख़ाक किया जाएगा.
अल्लामा ज़मीर अख्तर नकवी का 24 मार्च 1944 को लखनऊ के वजीरगंज इलाके में जन्म हुआ था. वह वर्ष 1948 को अपने माँ-बाप के साथ पाकिस्तान चले गए थे. पाकिस्तान जाने के बाद भी उनका हिन्दुस्तान के साथ रिश्ता बना रहा और वह बराबर यहाँ आते रहे.

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शिया धर्म की शिक्षा लेने के बाद वह मजलिस (धार्मिक व्याख्यान) के लिए हिन्दुस्तान आने लगे. लखनऊ में होने वाली मजलिसों को खिताब करते हुए वह जब लखनऊ के इमामबाड़ों के बारे में वह बातें बताते थे जो यहाँ के लोगों को भी नहीं पता तो लोग रोमांचित हो जाते थे.
कई-कई घंटे लम्बी मजलिस के बावजूद लोगों को वक्त का अहसास नहीं होता था. ज्ञान का समुद्र था उनके पास. पाकिस्तान में एक मजलिस को खिताब करते हुए उन्होंने कहा था कि जो-जो चीज़ें हिन्दुस्तान के पास हैं वह सभी पाकिस्तान के पाद भी हैं. सरकार, संविधान, अदालत और झंडा लेकिन हिन्दुस्तान के पास जन-गण-मन भी है जो पाकिस्तान के पास नहीं है. हिन्दुस्तान के लोग इसी जन-गण-मन के ज़रिये एक सूत्र में बंधे हुए हैं. यही जन-गण-मन हिन्दुस्तान के लोगों को अपने तिरंगे के साथ जोड़े हुए है.
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अल्लामा ज़मीर अख्तर बचपन में ही पाकिस्तान चले गए थे लेकिन अपनी जन्मभूमि से उनकी मोहब्बत कभी कम नहीं हो पाई. यही वजह है कि लखनऊ की गलियां, लखनऊ के मोहल्ले, लखनऊ के इमामबाड़े, लखनऊ के अलम, लखनऊ की मजलिसें और लखनऊ के रास्ते हर वक्त उनके ज़ेहन में रहते थे. हिन्दुस्तान में होने वाली मजलिसों में इनका ज़िक्र कर वह लोगों के दिल जीत लेते थे. यही वजह है कि आज जब उनके निधन की खबर आई तो हिन्दुस्तान में भी शोक की लहर दौड़ गई.

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